Click to Download this video!
Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
07-07-2018, 12:15 PM,
#1
Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
जवानी की दहलीज-1

बात उन दिनों की है जब इस देश में टीवी नहीं होता था ! इन्टरनेट और मोबाइल तो और भी बाद में आये थे। मैं उन दिनों जवानी की दहलीज पर क़दम रख रही थी। मेरा नाम सरोजा है पर घर में मुझे सब भोली ही बुलाते हैं। मैं 19 साल की सामान्य लड़की हूँ, गेहुँवा रंग, कद 5'3", वज़न 50 किलो, लंबे काले बाल, जो आधी लम्बाई के बाद घुंघराले थे, काली आँखें, गोल नाक-नक्श, लंबी गर्दन, मध्यम आकार के स्तन और उभरे हुए नितम्भ।

हम कुरनूल (आंध्र प्रदेश) के पास एक कसबे में रहते थे। मेरे पिताजी वहाँ के जागीरदार और सांसद श्री रामाराव के फार्म-हाउस में बागवानी का काम करते थे। मेरी एक बहन शीलू है जो मुझसे चार साल छोटी है और उस पर भी यौवन का साया सा पड़ने लगा है। लड़कपन के कारण उसे उसके पनपते स्तनों का आभास नहीं हुआ है पर आस-पड़ोस के लड़के व मर्द उसे दिलचस्पी से देखने लगे हैं। पिछले साल उसकी पहली माहवारी ने उसे उतना ही चौंकाया और डराया था जितना हर अबोध लड़की को होता है।

मैंने ही उसे समझाया और संभाला था, उसके घर से बाहर जाने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई थीइ जैसा कि गांव की लड़कियों के साथ प्राय: होता है। मेरा एक भाई गुन्टू है जो कि मुझसे 12 साल छोटा है और जो मुझे माँ समान समझता है। वह बहुत छोटा था जब हमारी माँ एक सड़क हादसे में गुज़र गई थी और उसे एक तरह से मैंने ही पाला है।

हम एक गरीब परिवार के हैं और एक ऐसे समाज से सम्बंधित हैं जहाँ लड़कियों का कोई महत्त्व या औचित्य नहीं होता। जब माँ थी तो वह पहले खाना पिताजी और गुन्टू को देती थी और बाद में शीलू और मेरा नंबर आता था। वह खुद सबसे बाद में बचा-कुचा खाती थी। घर में कभी कुछ अच्छा बनता था या मिठाई आती थी तो वह हमें कम और पिताजी और गुन्टू को ज़्यादा मिलती थी। हालांकि गुन्टू मुझसे बहुत छोटा था फिर भी हमें उसका सारा काम करना पड़ता था। अगर वह हमारी शिकायत कर देता तो माँ हमारी एक ना सुनती। हमारे समाज में लड़कों को सगा और लड़कियों को पराई माना जाता है इसीलिए लड़कियों पर कम से कम खर्चा और ध्यान लगाया जाता है।

माँ के जाने के बाद मैंने भी गुन्टू को उसी प्यार और लाड़ से पाला था।

पिताजी हमारे मालिक के खेतों और बगीचों के अलावा उनके बाकी काम भी करने लगे थे। इस कारण वे अक्सर व्यस्त रहते थे और कई बार कुरनूल से बाहर भी जाया करते थे। मुझे घर के काम करने की आदत सी हो गई थी। वैसे भी हम लड़कियों को घर के काम करने की शुरुआत बहुत जल्दी हो जाया करती है और मैं तो अब 19 की होने को आई हूँ। अगर मेरी माँ जिंदा होती तो मेरी शादी कब की हो गई होती...

पर अब शीलू और गुन्टू की देखभाल के लिए मेरा घर पर होना ज़रूरी है इसलिए पिताजी मेरी शादी की जल्दी में नहीं हैं। हम रामारावजी के फार्म-हाउस की चारदीवारी के अंदर एक छोटे से घर में रहते हैं। हमारे घर के सब तरफ बहुत से फलों के पेड़ लगे हुए हैं जो कि पिताजी ने कई साल पहले लगाये थे। पास ही एक कुंआ भी है। रामारावजी ने कुछ गाय-भैंस भी रखी हुई हैं जिनका बाड़ा हमारे घर से कुछ दूर पर है।

रामारावजी एक कड़क किस्म के इंसान हैं जिनसे सब लोग बहुत डरते हैं पर वे अंदर से दयालु और मर्मशील हैं। वे अपने सभी नौकरों की अच्छी तरह देखभाल करते हैं। उनकी दया से हम गरीब हो कर भी अच्छा-भला खाते-पीते हैं। शीलू और गुन्टू भी उनकी कृपा से ही स्कूल जा पा रहे हैं।

रामारावजी की पत्नी का स्वर्गवास हुए तीन बरस हो गए थे। उनके तीन बेटे हैं जो कि जागीरदारी ठाटबाट के साथ बड़े हुए हैं। उनमें बड़े घर के बिगड़े हुए बेटों के सभी लक्षण हैं। सबसे बड़ा, महेश, 25-26 साल का होगा। उसे हैदराबाद के कॉलेज से निकाला जा चुका था और वह कुरनूल में दादागिरी करता था। उसका एक गिरोह था जिसमें हमेशा 4-5 लड़के होते थे जो एक खुली जीप में आते-जाते। उनका काम मटरगश्ती करना, लड़कियों को छेड़ना और अपने बाप के नाम पर ऐश करना होता था। महेश शराब और सिगरेट का शौक़ीन था और लड़कियाँ उसकी कमजोरी थीं। दिखने में महेश कोई खास नहीं था बल्कि उसके गिरोह के लगभग सभी लड़के उससे ज़्यादा सुन्दर, सुडौल, लंबे और मर्दाना थे पर बाप के पैसे और रुतबे के चलते, रौब महेश का ही चलता था।

महेश से छोटा, सुरेश, कोई 22 साल का होगा। वह पढ़ाकू किस्म का था और कई मायनों में महेश से बिल्कुल अलग। वह कुरनूल के ही एक कॉलेज में पढ़ता था और घर पर उसका ज़्यादातर समय इन्टरनेट और किताबों में बीतता था। उसका व्यक्तित्व और उसके शौक़ ऐसे थे कि वह अक्सर अकेला ही रहता था।

सुरेश से छोटा भाई, नितेश था जो 19 साल का होगा। वह एक चंचल, हंसमुख और शरारती स्वभाव का लड़का था। उसने अभी अभी जूनियर कॉलेज खत्म किया था और वह विदेश में आगे की पढ़ाई करना चाहता था। इस मामले में रामारावजी उससे सहमत थे। उन्हें अपने सबसे छोटे बेटे से बहुत उम्मीदें थीं... उन्हें भरोसा हो गया था कि महेश उनके हाथ से निकल गया है और सुरेश का स्वभाव ऐसा नहीं था कि वह उनकी उम्मीदों पर खरा उतरे क्योंकि वह राजनीति या व्यापार दोनों के लायक नहीं था।

तीनों भाई दिखने, पहनावे, व्यवहार और अपने तौर-तरीकों में एक दूसरे से बिल्कुल अलग अलग थे।

मुझे तीनों में से नितेश सबसे अच्छा लगता था। एक वही था जो अगर मुझे देखता तो मुस्कुराता था। कभी कभी वह मुझसे बात भी करता था। कोई खास नहीं... "तुम कैसी हो?... घर में सब कैसे हैं?.... कोई तकलीफ़ तो नहीं?" इत्यादि पूछता रहता था।

नितेश मुझे बहुत अच्छा लगता था, सारे जवाब मैं सर झुकाए नीची नज़रों से ही देती थी। मेरे जवाब एक दो शब्द के ही होते थे... ज़्यादा कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं होती थी। इतने बड़े घर के लड़के से बात करने में हिचकिचाहट भी होती और लज्जा भी आती थी। कभी कभी, अपनी उँगलियों में अपनी चुन्नी के किनारे को मरोड़ती हुई अपनी नज़रें ऊपर करने की कोशिश करती थी... पर नितेश से नज़रें मिलते ही झट से अपने पैरों की तरफ नीचे देखने लगती थी।

नितेश अक्सर हँस दिया करता पर एक बार उसने अपनी ऊँगली से मेरी ठोड़ी ऊपर करते हुए पूछा,"नीचे क्यों देख रही हो? मेरी शकल देखने लायक नहीं है क्या?"

उसके स्पर्श से मैं सकपका गई और मेरी आवाज़ गुम हो गई। कुछ बोल नहीं पाई। उसका हाथ मेरी ठोड़ी से हटा नहीं था। मेरा चेहरा ऊपर पर नज़रें नीचे गड़ी थीं।

"अब मैं दिखने में इतना बुरा भी नहीं हूँ !" कहते हुए उसने मेरी ठोड़ी और ऊपर कर दी और एक छोटा कदम आगे बढ़ाते हुए मेरे और नजदीक आ गया।

मेरी झुकी हुई आँखें बिल्कुल बंद हो गईं। मेरी सांस तेज़ हो गई और मेरे माथे पर पसीने की छोटी छोटी बूँदें छलक पड़ीं।

नितेश ने मेरी ठोड़ी छोड़ कर अपने दोनों हाथ मेरे हाथों पर रख दिए जो चुन्नी के किनारे से गुत्थम-गुत्था कर रहे थे...

"इस बेचारे दुपट्टे ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? इसे क्यों मरोड़ रही हो?" कहते हुए नितेश ने मेरे हाथ अपने हाथों में ज़ोर से पकड़ लिए।

किसी लड़के ने मेरा हाथ इस तरह कभी नहीं पकड़ा था। मुझे यकायक रोमांच, भय, कुतूहल और लज्जा का एक साथ आभास हुआ। समझ में नहीं आया कि क्या करूँ।

एक तरफ नितेश की नज़दीकी और उसका स्पर्श मुझे अपार आनन्द का अनुभव करा रहा था वहीं हमारे बीच का अपार फर्क मुझे यह खुशी महसूस करने से रोक रहा था। मैं आँखें मूंदे खड़ी रही और धीरे से अपने हाथ नितेश के हाथों से छुड़ाने लगी।

"छोड़ो जी... कोई देख लेगा..." मेरे मुँह से मरी हुई आवाज़ निकली।

"तुम बहुत भोली हो" नितेश ने मेरा हाथ एक बार दबाकर छोड़ते हुए कहा। नितेश के उस छोटे से हाथ दबाने में एक आश्वासन और सांत्वना का संकेत था जो मुझे बहुत अच्छा लगा।

मैं वहाँ से भाग गई।

रामारावजी के घर में कई नौकर-चाकर थे जिनमें एक ड्राईवर था... कोई 30-32 साल का होगा। उसका वैसे तो नाम गणपत था पर लोग उसे भोंपू के नाम से बुलाते थे क्योंकि गाड़ी चलाते वक्त उसे ज़्यादा होर्न बजाने के लत थी। भोंपू शादीशुदा था पर उसका परिवार उसके गांव ओंगोल में रहता था। उसकी पत्नी ने हाल ही में एक बिटिया को जन्म दिया था। भोंपू एक मस्त, हंसमुख किस्म का आदमी था। वह दसवीं तक पढ़ा हुआ भी था और गाड़ी चलाने के अलावा अपने फ्री समय में बच्चों को ट्यूशन भी दिया करता था।

इस वजह से उसका आना-जाना हमारे घर भी होता था। हफ्ते में दो दिन और हर छुट्टी के दिन वह शीलू और गुंटू को पढ़ाने आता था। उसका चाल-चलन और पढाने का तरीका दोनों को अच्छा लगता था और वे उसके आने का इंतज़ार किया करते थे। जब पिताजी बाहर होते वह हमारे घर के मरदाना काम भी खुशी खुशी कर देता था। भोंपू शादी-शुदा होने के कारण यौन-सुख भोग चुका था और अपनी पत्नी से दूर रहने के कारण उसकी यौन-पिपासा तृप्त नहीं हो पाती थी। ऐसे में उसका मेरी ओर खिंचाव प्राकृतिक था। वह हमेशा मुझे आकर्षित करने में लगा रहता। वह एक तंदुरुस्त, हँसमुख, मेहनती और ईमानदार इंसान था। अगर वह विवाहित ना होता तो मुझे भी उसमें दिलचस्पी होती।

एक दिन जब वह बच्चों को पढ़ा रहा था और मैं खाना बना रही थी, मेरा पांव रसोई में फिसल गया और मैं धड़ाम से गिर गई। गिरने की आवाज़ और मेरी चीख सुनकर वह भागा भागा आया। मेरे दाहिने पैर में मोच आ गई थी और मैंने अपना दाहिना घुटना पकड़ा हुआ था।
Reply
07-07-2018, 12:15 PM,
#2
RE: Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
उसने मेरा पैर सीधा किया और घुटने की तरफ देख कर पूछा,"क्या हुआ?"

मैंने उसे बताया मेरा पांव फिसलते वक्त मुड़ गया था और मैं घुटने के बल गिरी थी। उसने बिना हिचकिचाहट के मेरा घाघरा घुटने तक ऊपर किया और मेरा हाथ घुटने से हटाने के बाद उसका मुआयना करने लगा। उसने जिस तरह मेरी टांगें घुटने तक नंगी की मुझे बहुत शर्म आई और मैंने झट से अपना घाघरा नीचे खींचने की कोशिश की।

ऐसा करने में मेरे मोच खाए पैर में ज़ोर का दर्द हुआ और मैं नीचे लेट गई। इतने में शीलू और गुंटू भी वहाँ आ गए और एक साथ बोले "ओह... दीदी... क्या हुआ?"

"यहाँ पानी किसने गिराया था? मैं फिसल गई..." मैंने करहाते हुए कहा।

"सॉरी दीदी... पानी की बोतल भरते वक्त गिर गया होगा..." गुंटू ने कान पकड़ते हुए कहा।

"कोई बात नहीं... तुम दोनों जाकर पढ़ाई करो... मैं ठीक हूँ !"

जब वे नहीं गए तो मैंने ज़ोर देकर कहा,"चलो... जाओ..." और वे चले गए।

अब भोंपू ने अपने हाथ मेरी गर्दन और घुटनों के नीचे डाल कर मुझे उठा लिया और खड़ा हो गया। मैंने अपनी दाहिनी टांग सीधी रखी और दोनों हाथ उसकी गरदन में डाल दिए। उसने मुझे अपने बदन के साथ सटा लिया और छोटे छोटे कदमों से मेरे कमरे की ओर चलने लगा।

उसे कोई जल्दी नहीं थी... शायद वह मेरे शरीर के स्पर्श और मेरी मजबूर हालत का पूरा फ़ायदा उठाना चाहता होगा। उसकी पकड़ इस तरह थी कि मेरा एक स्तन उसके सीने में गड़ रहा था। उसकी नज़रें मेरी आँखों में घूर रही थीं... मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।

उसने मुझे ठीक से उठाने के बहाने एक बार अपने पास चिपका लिया और फिर अपना एक हाथ मेरी पीठ पर और एक मेरे नितम्भ पर लगा दिया। ना जाने क्यों मुझे उसका स्पर्श अच्छा लग रहा था... पहली बार किसी मर्द ने मुझे इस तरह उठाया था। मेरे बदन में एक सुरसुराहट सी होने लगी थी...

कमरे में पहुँच कर उसने धीरे से झुक कर मुझे बिस्तर पर डालने की कोशिश की। वह चाहता तो मुझे सीधा बिस्तर पर डाल सकता था पर उसने मुझे अपने बदन से सटाते हुए नीचे सरकाना शुरू किया जिससे मेरी पीठ उसके पेट से रगड़ती हुई नीचे जाने लगी और एक क्षण भर के लिए उसके उठे हुए लिंग का आभास कराते हुए मेरी पीठ बिस्तर पर लग गई।

अब मैं बिस्तर पर थी और उसके दोनों हाथ मेरे नीचे। उसने धीरे धीरे अपने हाथ सरकाते हुए बाहर खींचे... उसकी आँखों में एक नशा सा था और उसकी सांस मानो रुक रुक कर आ रही थी। वह मुझे एक अजीब सी नज़र से देख रहा था... उसका ध्यान मेरे वक्ष, पेट और जाँघों पर केंद्रित था।

मैं चोरी चोरी नज़रों से उसे देख रही थी।

उसने सीधे होकर एक बार अपने हाथों को ऊपर और पीछे की ओर खींच कर अंगड़ाई सी ली जिससे उसका पेट और जांघें आगे को मेरी तरफ झुक गईं। उसके तने हुए लिंग का उभार उसकी पैन्ट में साफ़ दिखाई दे रहा था। कुछ देर इस अवस्था में रुक कर उसने हम्म्म्म की आवाज़ निकालते हुए अपने आप को सीधा किया। फिर उसने शीलू को बुलाकर थोड़ा गरम पानी और तौलिया लाने को कहा। जब तक शीलू ये लेकर आती उसने गुंटू और शीलू के गणित अभ्यास के लिए कुछ सवाल लिख दिए जिन्हें करने में वे काफी समय तक व्यस्त रहेंगे। तब तक शीलू गरम पानी और तौलिया ले आई।

"शीलू और गुंटू ! मैंने तुम दोनों के लिए कुछ सवाल लिख दिए हैं... तुम दोनों उनको करो... तब तक मैं तुम्हारी दीदी की चोट के बारे में कुछ करता हूँ... ठीक है?"

"ठीक है।" कहकर शीलू ने मेरी ओर देखा और पूछा,"अब कैसा लग रहा है?"

मैंने कहा,"पहले से ठीक है.... तुम जाओ और पढ़ाई करो..." मैंने अधीरता से कहा।

पता नहीं क्यों मेरा मन भोंपू के साथ समय बिताने का हो रहा था... मन में एक उत्सुकता थी कि अब वह क्या करेगा...

"कुछ काम हो तो मुझे बुला लेना..." कहती हुई शीलू भाग गई।

भोंपू ने एक कुर्सी खींच कर बिस्तर के पास की और उस पर गरम पानी और तौलिया रख दिया... फिर खुद मेरे पैरों की तरफ आकर बैठ गया और मेरा दाहिना पांव अपनी गोद में रख लिया। फिर उसने तौलिए को गरम पानी में भिगो कर उसी में निचोड़ा और गरम तौलिए से मेरे पांव को सेंक देने लगा। गरम सेंक से मुझे आराम आने लगा। थोड़ा सेंकने के बाद उसने मेरे पांव को हल्के हल्के गोल-गोल घुमाना शुरू किया। मेरा दर्द पहले से कम था पर फिर भी था। मेरे "ऊऊंह आह" करने पर उसने पांव फिर सी अपनी जांघ पर रख दिया और गरम तौलिए से दुबारा सेंकने लगा। ठोड़ी देर में पानी ठंडा हो गया तो उसने शीलू को बुला कर और गरम पानी लाने को कहा।

जब तक वह लाती भोंपू ने मेरे दाहिने पैर और पिंडली को सहलाना और दबाना शुरू कर दिया। वह प्यार से हाथ चला रहा था... सो मुझे भी मज़ा आ रहा था।

जब शीलू गरम पानी देकर चली गई तो भोंपू ने मेरे दाहिने पैर को अपनी जाँघों के बीच में बिस्तर पर टिका दिया। उसकी दाईं टांग मेरी टांगों के बीच, घुटनों से मुड़ी हुई बिस्तर पर टिकी थी और उसकी बाईं टांग बिस्तर से नीचे ओर लटक रही थी। अब उसने तौलिए को गीला करके मेरे दाहिने घुटने की सेंक करना शुरू किया। ऐसा करने के लिए जब वह आगे को झुकता तो मेरे दाहिने पांव का तलवा उसकी जाँघों के बीच उसकी तरफ खिसक जाता। एक दो बार इस तरह करने से मेरा तलवा हल्के से उसके लिंग के इलाके को छूने लगा। उसके छूते ही जहाँ मेरे शरीर में एक डंक सा लगा मैंने देखा कि भोंपू के शरीर से एक गहरी सांस छूटी और उसने एक क्षण के लिए मेरे घुटने की मालिश रोक दी। अब उसने अपने कूल्हों को हिला-डुला कर अपने आप को थोड़ा आगे कर लिया। अब जब वह आगे झुकता मेरा तलवा उसके यौनांग पर अच्छी तरह ऐसे लग रहा था मानो ड्राईवर ब्रेक पेडल दबा रहा हो। मेरे तलवे को कपड़ों में छुपे उसके लिंग का उभार महसूस हो रहा था।

kramashah.........................
Reply
07-07-2018, 12:15 PM,
#3
RE: Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
जवानी की दहलीज-2

मुझे मज़ा आ रहा था पर मैं भोली बनी रही। मैंने अपनी कलाई अपनी आँखों पर रख ली और आँखें मूंदकर अपने चेहरे को छुपाने का प्रयत्न करने लगी।

"एक मिनट सरोज !" कहकर उसने अपना हाथ मेरे घुटने से हटाया और वह पीछे हुआ। उसने पीछे खिसक कर मेरे तलवे का संपर्क अपने भुजंग से अलग किया। उफ़... मुझे लगा शायद ये जा रहा है... मैंने चोरी निगाह से देखा तो भोंपू अपना हाथ अपनी पैन्ट में डाल कर अपने लिंग को व्यवस्थित कर रहा था... उसने लिंग का मुँह नीचे की तरफ से उठाकर ऊपर की तरफ कर दिया। मुझे लगा उसे ऐसा करने से आराम मिला। फिर वह पहले की तरह आगे खिसक कर बैठ गया और मेरे तलवे का संपर्क दोबारा अपने अर्ध-उत्तेजित लिंग से करा दिया। मुझे जो डर था कि वह चला जायेगा अब दूर हुआ और मैंने अंदर ही अंदर एक ठंडी सांस ली।

अब भोंपू ने मेरे घुटने की तरफ से ध्यान हटा लिया था और उसकी उँगलियाँ घुटने के पीछे वाले मुलायम हिस्से और घुटने से थोड़ा ऊपर और नीचे चलने लगी थीं। मुझे भी अपनी मोच और घुटने का दर्द काफूर होता लगने लगा था। उसकी मरदानी उँगलियों का अपनी टांग पर नाच मुझे मज़ा देने लगा था। मेरे मन में एक अजीब सी अनुभूति उत्पन्न हो रही थी। मुझे लगा मुझे सुसू आ रहा है और मैंने उसको रोकने के यत्न में अपनी जांघें जकड़ लीं।

तभी अनायास मुझे महसूस हुआ कि भोंपू का दूसरा हाथ मेरी दूसरी टांग पर भी चलने लगा है। उसके दोनों हाथ मेरी पिंडलियों को मल रहे थे... कभी हथेलियों से गूंदते तो कभी उँगलियों से गुदगुदाते। मेरे शरीर में कंपकंपी सी होने लगी।

उधर भोंपू ने अपने कोल्हू को थोड़ा और आगे कर दिया था जिससे मेरे तलवे का उसके लिंग पर दबाव और बढ़ गया था। अब मैं अपने तलवे के स्पर्श से उसके लिंग के आकार का भली-भांति अहसास कर सकती थी। मुझे लगा वह पहले से बड़ा हो गया है और उसका रुख मेरे तलवे की तरफ हो गया था। मेरे तलवे के कोमल हिस्से पर उसके लिंग का सिरा बेशर्मी से लग रहा था।

अचानक भोंपू ने अपने कूल्हों को थोड़ा और आगे की ओर खिसकाया और अपने दोनों हाथ मेरे घुटनों के ऊपर... निचली जाँघों तक चलाने लगा। मेरा तलवा अब उसके लिंग को मसलने लगा था। मेरा दायाँ पांव अपने आप दायें-बाएं और ऊपर-नीचे होकर उसके लिंग को अच्छी तरह से से छूने लगा था। मेरे तन-बदन में चिंगारियाँ फूटने लगीं। मुझे लगा अब मैं सुसू रोक नहीं पाऊँगी। उधर भोंपू की उँगलियाँ अब बहुत बहादुर हो गई थीं और अब वे अंदरूनी जाँघों तक जाने लगी थीं। मेरी साँसें तेज़ होने लगी... मुझे ज़ोरों का सुसू आ रहा था पर मैं अभी जाना नहीं चाहती थी... बहुत मज़ा आ रहा था।

भोंपू अब बेहिचक आगे-पीछे होते हुए अपने हाथ मेरी जाँघों पर चला रहा था... मेरा पैर उसके लिंग का नाप-तोल कर रहा था। अचानक भोंपू थोड़ा ज्यादा ही आगे की ओर हुआ और उसके दोनों अंगूठे हल्के से मेरी योनि द्वार से पल भर के लिए छू गए। मुझे ऐसा करंट जीवन में पहले कभी नहीं लगा था... मैं उचक गई और मुझे लगा मेरा सुसू निकल गया है। मैंने अपनी टांगें हिला कर भोंपू के हाथों को वहाँ से हटाया और अपने दोनों हाथ अपनी योनि पर रख दिए। मेरी योनि गीली हो गई थी। मुझे ग्लानि हुई कि मेरा सुसू निकल गया है पर फिर अहसास हुआ कि ये सुसू नहीं मेरा योनि-रस था। मुझे बहुत लज्जा आ रही थी।

उधर भोंपू ने अपने हाथ मेरे जाँघों से हटा लिए थे और अब उसने अपने हाथ अपने कूल्हों के बराबर बिस्तर पर रख लिए और उनके सहारे अपने कूल्हों को हल्का हल्का आगे-पीछे कर रहा था। वह मेरे दायें तलवे से अपने लिंग को मसलने की कोशिश कर रहा था। मुझे मज़े से ज़्यादा लज्जा आ रही थी सो मैंने अपना पांव अपनी तरफ थोड़ा खींच लिया।

पर भोंपू को कुछ हो गया था... उसने आगे खिसक कर फिर संपर्क बना लिया और अपने लिंग को मेरे तलवे के साथ रगड़ने लगा। उसका चेहरा अकड़ने लगा था और सांस फूलने लगी थी... उसने अपनी गति तेज़ की और फिर अचानक वहाँ से भाग कर गुसलखाने में चला गया.

भोंपू को कुछ हो गया था... उसने आगे खिसक कर फिर संपर्क बना लिया और अपने लिंग को मेरे तलवे के साथ रगड़ने लगा। उसका चेहरा अकड़ने लगा था और सांस फूलने लगी थी... उसने अपनी गति तेज़ की और फिर अचानक वहाँ से भाग कर गुसलखाने में चला गया...

भोंपू के अचानक भागने की आवाज़ सुनकर शीलू और गुंटू दोनों कमरे में आ गए,"क्या हुआ दीदी? सब ठीक तो है?"

"हाँ... हाँ सब ठीक है।"

"मास्टरजी कहाँ गए?"

"बाथरूम गए हैं... तुमने सवाल कर लिए?"

"नहीं... एक-दो बचे हैं !"

"तो उनको कर लो... फिर खाना खाएँगे... ठीक है?"

"ठीक है।" कहकर वे दोनों चले गए।

भोंपू तभी गुसलखाने से वापस आया। उसका चेहरा चमक रहा था और उसकी चाल में स्फूर्ति थी। उसने मेरी तरफ प्यार से देखा पर मैं उससे नज़र नहीं मिला सकी।

"अब दर्द कैसा है?" उसने मासूमियत से पूछा।

"पहले से कम है...अब मैं ठीक हूँ।"

"नहीं... तुम ठीक नहीं हो... अभी तुम्हें ठीक होने में 2-4 दिन लगेंगे... पर चिंता मत करो... मैं हूँ ना !!" उसने शरारती अंदाज़ में कहा।

"नहीं... अब बहुत आराम है... मैं कर लूंगी..." मैंने मायूस हो कर कहा।

"तो क्या तुम्हें मेरा इलाज पसंद नहीं आया?" भोंपू ने नाटकीय अंदाज़ में पूछा।

"ऐसा नहीं है... तुम्हें तकलीफ़ होगी... और फिर चोट इतनी भी नहीं है।"

"तकलीफ़ कैसी... मुझे तो मज़ा आया... बल्कि यूँ कहो कि बहुत मज़ा आया... तुम्हें नहीं आया?" उसने मेरी आँखों में आँखें डालते हुए मेरा मन टटोला।

मैंने सर हिला कर हामी भर दी। भोंपू की बांछें खिल गईं और वह मुझे प्यार भरे अंदाज़ से देखने लगा। तभी दोनों बच्चे आ गए और भोंपू की तरफ देखकर कहने लगे,"हमने सब सवाल कर लिए... आप देख लो।"

"शाबाश ! चलो देखते हैं तुम दोनों ने कैसा किया है... और हाँ, तुम्हारी दीदी की हालत ठीक नहीं है... उसको ज़्यादा काम मत करने देना... मैं बाहर से खाने का इंतजाम कर दूंगा... अपनी दीदी को आराम करने देना... ठीक है?" कहता हुआ वह दोनों को ले जाने लगा।जाते जाते उसने मुड़कर मेरी तरफ देखा और एक हल्की सी आँख मार दी।

"ठीक है।" दोनों ने एक साथ कहा।

"तो क्या हमें चिकन खाने को मिलेगा?" गुंटू ने अपना नटखटपना दिखाया।

"क्यों नहीं !" भोंपू ने जोश के साथ कहा और शीलू की तरफ देखकर पूछा,"और हमारी शीलू रानी को क्या पसंद है?"

"रस मलाई !" शीलू ने कंधे उचका कर और मुँह में पानी भरते हुए कहा।

"ठीक है... बटर-चिकन और रस-मलाई... और तुम क्या खाओगी?" उसने मुझसे पूछा।

"जो तुम ठीक समझो !"

"तो ठीक है... अगले 2-4 दिन... जब तक तुम पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती तुम आराम करोगी... खाना मैं लाऊँगा और तुम्हारे लिए पट्टी भी !"

"जी !"

"अगर तुमने अपना ध्यान नहीं रखा तो हमेशा के लिए लंगड़ी हो जाओगी... समझी?" उसने मेरी तरफ आँख मारकर कहा।

"जी... समझी।" मैंने मुस्कुरा कर कहा।

"ठीक है... तो अब मैं चलता हूँ... कल मिलते हैं..." कहकर भोंपू चला गया।

मेरे तन-मन में नई कशिश सी चल रही थी, रह रह कर मुझे भोंपू के हाथ और उँगलियों का स्पर्श याद आ रहा था... कितना सुखमय अहसास था। मैंने अपने दाहिने तलवे पर हाथ फिराया और सोचा वह कितना खुश-किस्मत है... ना जाने क्यों मेरा हाथ उस तलवे से ईर्ष्या कर रहा था। मेरे तन-मन में उत्सुकता जन्म ले रही थी जो भोंपू के जिस्म को देखना, छूना और महसूस करना चाहती थी। ऐसी कामना मेरे मन में पहले कभी नहीं हुई थी।

मैंने देखा मेरे पांव और घुटने का दर्द पहले से बहुत कम है और मैं चल-फिर सकती हूँ। पर फिर मुझे भोंपू की चेतावनी याद आ गई... मैं हमेशा के लिए लंगड़ी नहीं रहना चाहती थी। फिर सोचा... उसने मुझे आँख क्यों मारी थी? क्या वह मुझे कोई संकेत देना चाहता था? क्या उसे भी पता है मेरी चोट इतनी बड़ी नहीं है? ...क्या वह इस चोट के बहाने मेरे साथ समय बिताना चाहता है? सारी रात मैं इसी उधेड़-बुन में रही... ठीक से नींद भी नहीं आई।
Reply
07-07-2018, 12:16 PM,
#4
RE: Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
अगले दिन सुबह सुबह ही भोंपू मसाला-दोसा लेकर आ गया। शीलू ने कॉफी बनाईं और हमने नाश्ता किया। नाश्ते के बाद भोंपू काम पर जाने लगा तो शीलू और गुंटू को रास्ते में स्कूल छोड़ने के लिए अपने साथ ले गया। जाते वक्त उसने मेरी तरफ आँखों से कुछ इशारा करने की कोशिश की पर मुझे समझ नहीं आया।

मैंने उसकी तरफ प्रश्नात्मक तरीके से देखा तो उसने छुपते छुपते अपने एक हाथ को दो बार खोल कर 'दस' का इशारा किया और मुस्कुरा कर दोनों बच्चों को लेकर चला गया।

मैं असमंजस में थी... दस का क्या मतलब था?

अभी आठ बज रहे थे। क्या वह दस बजे आएगा? उस समय तो घर पर कोई नहीं होता... उसके आने के बारे में सोचकर मेरी बांछें खिलने लगीं... मेरे अंग अंग में गुदगुदी होने लगी... सब कुछ अच्छा लगने लगा... मैं गुनगुनाती हुई घर साफ़ करने लगी... रह रह कर मेरी निगाह घड़ी की तरफ जाती... मुई बहुत धीरे चल रही थी। जैसे तैसे साढ़े नौ बजे और मैं गुसलखाने में गई... मैंने अपने आप को देर तक रगड़ कर नहलाया, अच्छे से चोटी बनाईं, साफ़ कपड़े पहने और फिर भोंपू का इंतज़ार करने लगी।

हमारे यहाँ जब लड़की वयस्क हो जाती है, यानि जब उसको मासिक-धर्म होने लगता है, तबसे लेकर जब तक उसकी शादी नहीं हो जाती उसकी पोशाक तय होती है। वह चोली, घाघरा और चोली के ऊपर एक दुपट्टे-नुमा कपड़ा लेती है जिससे वह अपना वक्ष ढक कर रखती है। इस पोशाक को हाफ-साड़ी भी कहते हैं। इसे पहनने वाली लड़कियाँ शादी के लिए तैयार मानी जाती हैं। शादी के बाद लड़कियाँ केवल साड़ी ही पहनती हैं। जो छोटी लड़कियाँ होती हैं, यानि जिनका मासिक-धर्मं शुरू नहीं हुआ होता, वे फ्रॉक या बच्चों लायक कपड़े पहनती हैं। मैंने प्रथानुसार हाफ-साड़ी पहनी थी।

दस बज गए पर वह नहीं आया। मेरा मन उतावला हो रहा था। ये क्यों नहीं आ रहा? कहीं उसका मतलब कुछ और तो नहीं था? ओह... आज नौ तारीख है... कहीं वह दस तारीख के लिए इशारा तो नहीं कर रहा था? मैं भी कितनी बेवकूफ हूँ... दस बज कर बीस मिनट हो रहे थे और मुझे भरोसा हो गया था कि वह अब नहीं आयेगा।

मैं उठ कर कपड़े बदलने ही वाली थी कि किसी ने धीरे से दरवाज़ा खटखटाया।

मैं चौंक गई... पर फिर संभल कर... जल्दी से दरवाज़ा खोलने गई। सामने भोंपू खड़ा था... उसके चेहरे पर मुस्कराहट, दोनों हाथों में ढेर सारे पैकेट... और मुँह में एक गुलाब का फूल था।

उसे देखकर मैं खुश हो गई और जल्दी से आगे बढ़कर उसके हाथों से पैकेट लेने लगी... उसने अपने एक हाथ का सामान मुझे पकड़ा दिया और अंदर आ गया। अंदर आते ही उसने अपने मुँह में पकड़ा हुआ गुलाब निकाल कर मुझे झुक कर पेश किया। किसी ने पहली बार मुझे इस तरह का तोहफा दिया था। मैंने खुशी से उसे ले लिया।

"माफ करना ! मुझे देर हो गई... दस बजे आना था पर फिर मैंने सोचा दोपहर का खाना लेकर एक बार ही चलूँ... अब हम बच्चों के वापस आने तक फ्री हैं !"

"अच्छा किया... एक बार तो मैं डर ही गई थी।"

"किस लिए?"

"कहीं तुम नहीं आये तो?" मैंने शरमाते हुए कहा।

"ऐसा कैसे हो सकता है?... साब हैदराबाद गए हुए हैं और बाबा लोग भी बाहर हैं... मैं बिलकुल फ्री हू॥"

"चाय पियोगे?"

"और नहीं तो क्या...? और देखो... थोड़ा गरम पानी अलग से इलाज के लिए भी चाहिये।"

मैं चाय बनाने लगी और भोंपू बाजार से लाये सामान को मेज़ पर जमाने लगा।

"ठीक है... चीनी?"

"वैसे तो मैं दो चम्मच लेता हूँ पर तुम बना रही हो तो एक चम्मच भी काफी होगी " भोंपू आशिकाना हो रहा था।

"चलो हटो... अब बताओ भी?" मैंने उसकी तरफ नाक सिकोड़ कर पूछा।

"अरे बाबा... एक चम्मच बहुत है... और तुम भी एक से ज़्यादा मत लेना... पहले ही बहुत मीठी हो..."

"तुम्हें कैसे मालूम?"

"क्या?"

"कि मैं बहुत मीठी हूँ?"

"ओह... मैंने तो बिना चखे ही बता दिया... लो चख के बताता हूँ..." कहते हुए उसने मुझे पीछे से आकर जकड़ लिया और मेरे मुँह को अपनी तरफ घुमा कर मेरे होंटों पर एक पप्पी जड़ दी।

"अरे... तुम तो बहुत ज्यादा मीठी हो... तुम्हें तो एक भी चम्मच चीनी नहीं लेनी चाहिए..."

"और तुम्हें कम से कम दस चम्मच लेनी चाहिए !" मैंने अपने आप को उसके चंगुल से छुडाते हुए बोला... "एकदम कड़वे हो !!"

"फिर तो हम पक्का एक दूसरे के लिए ही बने हैं... तुम मेरी कड़वाहट कम करो, मैं तुम्हारी मिठास कम करता हूँ... दोनों ठीक हो जायेंगे!!"

"बड़े चालाक हो..."

"और तुम चाय बहुत धीरे धीरे बनाती हो..." उसने मुझे फिर से पीछे से पकड़ने की कोशिश करते हुए कहा।

"देखो चाय गिर जायेगी... तुम जल जाओगे।" मैंने उसे दूर करते हुए चाय कप में डालनी शुरू की।

"क्या यार.. एक तो तुम इतनी धीरे धीरे चाय बनाती हो और फिर इतनी गरम बनाती हो... पूरा समय तो इसे पीने में ही निकल जायेगा !!!"

"क्यों?... तुम्हें कहीं जाना है?" मैंने चिंतित होकर पूछा।

"अरे नहीं... तुम्हारा 'इलाज' जो करना है... उसके लिए समय तो चाहिए ना !!" कहते हुए उसने चाय तश्तरी में डाली और सूड़प करके पी गया।

"अरे... ये क्या?... धीरे धीरे पियो... मुंह जल जायेगा..."

"चाय तो रोज ही पीते हैं... तुम्हारा इलाज रोज-रोज थोड़े ही होता है... तुम भी जल्दी पियो !" उसने गुसलखाने जाते जाते हुक्म दिया।

मैंने जैसे तैसे चाय खत्म की तो भोंपू आ गया।

"चलो चलो... डॉक्टर साब आ गए... इलाज का समय हो गया..." भोंपू ने नाटकीय ढंग से कहा।

मैं उठने लगी तो मेरे कन्धों पर हाथ रखकर मुझे वापस बिठा दिया।

"अरे... तुम्हारे पांव और घुटने में चोट है... इन पर ज़ोर मत डालो... मैं हूँ ना !"

और उसने मुझे अपनी बाहों में उठा लिया... मैंने अपनी बाहें उसकी गर्दन में डाल दी... उसने मुझे अपने शरीर के साथ चिपका लिया और मेरे कमरे की तरफ चलने लगा।

"बड़ी खुशबू आ रही है... क्या बात है?"

"मैं तो नहाई हूँ... तुम नहाये नहीं क्या?"

"नहीं... सोचा था तुम नहला दोगी !"

"धत्त... बड़े शैतान हो !"

"नहीं... बच्चा हूँ !"

"हरकतें तो बच्चों वाली नहीं हैं !!"

"तुम्हें क्या पता... ये हरकतें बच्चों के लिए ही करते हैं..."

"मतलब?... उफ़... तुमसे तो बात भी नहीं कर सकते...!!" मैंने उसका मतलब समझते हुए कहा।

उसने मुझे धीरे से बिस्तर पर लिटा दिया।

"कल कैसा लगा?"

"तुम बहुत शैतान हो !"

"शैतानी में ही मज़ा आता है ! मुझे तो बहुत आया... तुम्हें?"

"चुप रहो !"

"मतलब बोलूँ नहीं... सिर्फ काम करूँ?"

"गंदे !" मैंने मुंह सिकोड़ते हुए कहा और बिस्तर पर बैठ गई।

"ठीक है... मैं गरम पानी लेकर आता हूँ।"

भोंपू रसोई से गरम पानी ले आया। तौलिया मैंने बिस्तर पर पहले ही रखा था। उसने मुझे बिस्तर के एक किनारे पर पीठ के बल लिटा दिया और मेरे पांव की तरफ बिस्तर पर बैठ गया। उसके दोनों पांव ज़मीं पर टिके थे और उसने मेरे दोनों पांव अपनी जाँघों पर रख लिए। अब उसने गरम तौलिए से मेरे दोनों पांव को पिंडलियों तक साफ़ किया। फिर उसने अपनी जेब से दो ट्यूब निकालीं और उनको खोलने लगा। मैंने अपने आपको अपनी कोहनियों पर ऊँचा करके देखना चाहा तो उसने मुझे धक्का देकर वापस धकेल दिया।

"डरो मत... ऐसा वैसा कुछ नहीं करूँगा... देख लो एक विक्स है और दूसरी क्रीम... और अपना दुपट्टा मुझे दो।"

मैंने अपना दुपट्टा उसे पकड़ा दिया।

उसने मेरे चोटिल घुटने पर गरम तौलिया रख दिया और मेरे बाएं पांव पर विक्स और क्रीम का मिश्रण लगाने लगा। पांव के ऊपर, तलवे पर और पांव की उँगलियों के बीच में उसने अच्छी तरह मिश्रण लगा दिया। मुझे विक्स की तरावट महसूस होने लगी। मेरे जीवन की यह पहली मालिश थी। बरसों से थके मेरे पैरों में मानो हर जगह पीड़ा थी... उसकी उँगलियाँ और अंगूठे निपुणता से मेरे पांव के मर्मशील बिंदुओं पर दबाव डाल कर उनका दर्द हर रहे थे। कुछ ही मिनटों में मेरा बायाँ पांव हल्का और स्फूर्तिला महसूस होने लगा।कुछ देर और मालिश करने के बाद उस पांव को मेरे दुपट्टे से बाँध दिया और अब दाहिने पांव पर वही क्रिया करने लगा।

"इसको बांधा क्यों है?" मैंने पूछा।

"विक्स लगी है ना बुद्धू... ठण्ड लग जायेगी... फिर तेरे पांव को जुकाम हो जायेगा !!" उसने हँसते हुए कहा।

"ओह... तुम तो मालिश करने में तजुर्बेकार हो !"

"सिर्फ मालिश में ही नहीं... तुम देखती जाओ... !"

"गंदे !!"

"मुझे पता है लड़कियों को गंदे मर्द ही पसंद आते हैं... हैं ना?"

"तुम्हें लड़कियों के बारे बहुत पता है?"

"मेरे साथ रहोगी तो तुम्हें भी मर्दों के बारे में सब आ जायेगा !!"

"छी... गंदे !!"

kramashah.........................
Reply
07-07-2018, 12:16 PM,
#5
RE: Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
जवानी की दहलीज-3

उसने दाहिना पांव करने के बाद मेरा दुपट्टा उस पांव पर बाँध दिया और घुटने पर दोबारा एक गरम तौलिया रख दिया। मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। अब वह उठा और उसने मेरे दोनों पांव बिस्तर पर रख दिए और उनको एक चादर से ढक दिया। भोंपू अपनी कुर्सी खींच कर मेरे सिरहाने पर ले आया, वहाँ बैठ कर उसने मेरा सर एक और तकिया लगा कर ऊँचा किया और मेरे सर की मालिश करने लगा। मुझे इसकी कतई उम्मीद नहीं थी। उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में घूमने लगीं और धीरे धीरे उसने अपना हुनर मेरे माथे और कपाल पर दिखाना शुरू किया। वह तो वाकई में उस्ताद था। उसे जैसे मेरी नस नस से वाकफियत थी। कहाँ दबाना है... कितना ज़ोर देना है... कितनी देर तक दबाना है... सब आता है इसको।

मैं बस मज़े ले रही थी... उसने गर्दन के पीछे... कान के पास... आँखों के बीच... ऐसी ऐसी जगहों पर दबाव डाला कि ज़रा ही देर में मेरा सर हल्का लगने लगा और सारा तनाव जाता रहा। अब वह मेरे गालों, ठोड़ी और सामने की गर्दन पर ध्यान देने लगा। मेरी आँखें बंद थीं... मैंने चोरी से एक आँख खोल कर उसे देखना चाहा... देखा वह अपने काम में तल्लीन था... उसकी आँखें भी बंद थीं। मुझे ताज्जुब भी हुआ और उस पर गर्व भी... मैंने भी अपनी आँखें मूँद लीं।

अब उसके हाथ मेरे कन्धों पर चलने लगे थे। उसने मेरी गर्दन और कन्धों पर जितनी गांठें थीं सब मसल मसल कर निकाल दीं...

जहाँ जहाँ उसकी मालिश खत्म हो रही थी, वहां वहां मुझे एक नया हल्कापन और स्फूर्ति महसूस हो रही थी।

अचानक वह उठा और बोला,"मैं पानी पीने जा रहा हूँ... तुम ऊपर के कपड़े उतार कर उलटी लेट जाओ।"

मेरी जैसे निद्रा टूट गई... मैं तन्मय होकर मालिश का मज़ा ले रही थी... अचानक उसके जाने और इस हुक्म से मुझे अचम्भा सा हुआ। हालाँकि, अब मुझे भोंपू से थोड़ा बहुत लगाव होने लगा था और उसकी जादूई मालिश का आनन्द भी आने लगा था... पर उसके सामने ऊपर से नंगी होकर लेटना... कुछ अटपटा सा लग रहा था। फिर मैंने सोचा... अगर भोंपू को मेरे साथ कुछ ऐसा वैसा काम करना होता तो अब तक कर चुका होता... वह इतनी बढ़िया मालिश का सहारा नहीं लेता।

तो मैंने मन बना लिया... जो होगा सो देखा जायेगा... इस निश्चय के साथ मैंने अपने ऊपर के सारे कपड़े उतारे और औंधी लेट गई... लेट कर मैंने अपने ऊपर एक चादर ले ली और अपने हाथ अपने शरीर के साथ समेट लिए... मतलब मेरे बाजू मेरे बदन के साथ लगे थे और मेरे हाथ मेरे स्तन के पास रखे थे। मैं थोड़ा घबराई हुई थी... उत्सुक थी कि आगे क्या होगा... और मन में हलचल हो रही थी।

इतने में ही भोंपू वापस आ गया। वह बिना कुछ कहे बिस्तर पर चढ़ गया और जैसे घोड़ी पर सवार होते हैं, मेरे कूल्हे के दोनों ओर अपने घुटने रख कर मेरे कूल्हे पर अपने चूतड़ रखकर बैठ गया। उसका वज़न पड़ते ही मेरे मुँह से आह निकली और मैं उठने को हुई तो उसने अपना वज़न अपने घुटनों पर ले लिया... साथ ही मेरे कन्धों को हाथ से दबाते हुए मुझे वापस उल्टा लिटा दिया।

अब उसने मेरे ऊपर पड़ी हुई चादर मेरी कमर तक उघाड़ दी और उसे अपने घुटनों के नीचे दबा दिया। मैं डरे हुए खरगोश की तरह अपने आप में सिमटने लगी।

"अरे डरती क्यों है... तेरी मर्ज़ी के बिना मैं कुछ नहीं करूँगा, ठीक है?"

मैंने अपना सर हामी में हिलाया।

"आगे का इलाज कराना है?" उसने इलाज शब्द पर नाटकीय ज़ोर देते हुए पूछा।

मैंने फिर से सर हिला दिया।

"ऐसे नहीं... बोल कर बताओ..." उसने ज़ोर दिया।

"ठीक है... करवाना है" मैं बुदबुदाई।

"ठीक है... तो फिर आराम से लेटी रहो और मुझे अपना काम करने दो।" कहते हुए उसने मेरे दोनों हाथ मेरी बगल से दूर करते हुए ऊपर कर दिए। मुझे लगा मेरे स्तनों का कुछ हिस्सा मेरी बगल की दोनों ओर से झलक रहा होगा। मुझे शर्म आने लगी और मैंने आँखें बंद कर लीं।

उसने अपने हाथ रगड़ कर गरम किये और मेरे कन्धों और गर्दन को मसलना शुरू किया। मेरा शरीर तना हुआ था।

"अरे... इतनी टाईट क्यों हो रही हो... अपने आप को ढीला छोड़ो !" भोंपू ने मेरे कन्धों पर हल्की सी चपत लगाते हुए कहा।

मैंने अपने आप को ढीला छोड़ने की कोशिश की।

"हाँ... ऐसे... अब आराम से लेट कर मज़े लो !"

उसके बड़े और बलिष्ठ हाथ मेरी पीठ, कन्धों और बगल पर चलने लगे। उसका शरीर एक लय में आगे पीछे होकर उसके हाथों पर वज़न डाल रहा था। वैसे तो उसने अपना वज़न अपने घुटनों पर ले रखा था पर उसके ढूंगे मेरे नितम्बों पर लगे हुए थे... जब वह आगे जाते हुए ज़ोर लगा कर मेरी पीठ को दबाता था तो मेरे अंदर से ऊऊह निकल जाती... और जब पीठ पर उँगलियों के जोर से पीछे की ओर आता तो मेरी आह निकल जाती। मतलब वह लय में मालिश कर रहा था और मैं उसी लय में ऊऊह–आह कर रही थी...

अब उसने कुछ नया किया... अपने दोनों हाथ फैला कर मेरे कन्धों पर रखे और अपने दोनों अंगूठे मेरी रीढ़ की हड्डी की दरार पर रख कर उसने अंगूठों से दबा दबा कर ऊपर से नीचे आना शुरू किया... ऐसा करते वक्त उसकी फैली हुई उँगलियाँ मेरे बगल को गुदगुदा सी रही थीं। वह अपने अंगूठों को मेरी रीढ़ की हड्डी के बिलकुल नीचे तक ले आया और वहाँ थोड़ा रुक कर वापस ऊपर को जाने लगा।थोड़ा ऊपर जाने के बाद उसकी उँगलियों के सिरे मेरे पिचके हुए स्तनों के बाहर निकले हिस्सों को छूने लगे। मुझे बहुत गुदगुदी हुई। मैं सिहर गई और सहसा उठने लगी... उसने मुझे दबा कर फिर से लिटा दिया। वह मेरे शरीर पर अपना पूरा अधिकार सा जता रहा था... मुझे बहुत अच्छा लगा।

अब उसने अपनी दोनों हथेलियाँ जोड़ कर उँगलियाँ फैला दीं और मेरी पीठ पर जगह जगह छोटी उंगली की ओर से मारना शुरू किया। पहले छोटी उँगलियाँ लगतीं और फिर बाकी उँगलियाँ उनसे मिल जातीं... ऐसा होने पर दड़ब दड़ब आवाज़ भी आती... उसने ऐसे ही वार मेरे सर पर भी किये।

बड़ा अच्छा लग रहा था। फिर अपने दोनों हाथों की मुठ्ठियाँ बना कर मेरी पीठ पर इधर-उधर मारने लगा... कभी हल्के तो कभी ज़रा ज़ोर से। इसमें भी मुझे मजा आ रहा था। अब जो उसने किया इसका मुझे बिल्कुल अंदेशा नहीं था। वह आगे को झुका और अपने होटों से उसने मेरी गर्दन से लेकर बीच कमर तक रीढ़ की हड्डी पर पुच्चियाँ की कतार बना दी।

मैं भौचक्की हो गई पर बहुत अच्छा भी लगा।

"ओके, अब सीधी हो जाओ।" कह कर वह मेरे कूल्हों पर से उठ गया।

"ऊंह... ना !" मैंने इठलाते हुए कहा।

"क्यों?... क्या हुआ?"

"मुझे शर्म आती है।"

"मतलब तुम्हें बाकी इलाज नहीं करवाना?"

"करवाना तो है पर..."

"पर क्या?"

"तुम्हें आँखें बंद करनी होंगी।"

"ठीक है... पर मेरी भी एक शर्त है !!"

"क्या?"

"मैं आँखें बंद करके तुम्हारे पूरे बदन की मालिश करूँगा... मंज़ूर है?"

"ठीक है।"

"पूरे बदन का मतलब समझती हो ना? बाद में मत लड़ना... हाँ?"

"हाँ बाबा... समझ गई।" मेरे मन में खुशी की लहर दौड़ गई पर मैंने ज़ाहिर नहीं होने दिया।

"तो ठीक है... मैं तुम्हारे दुपट्टे को अपनी आँखों पर बाँध लेता हूँ।" और मैंने देखा वह बिस्तर के पास खड़ा हो कर दुपट्टा अपनी आँखों पर बाँध रहा था।

"हाँ... तो मैंने आँखों पर पट्टी बाँध ली है... अब तुम पलट जाओ।"
Reply
07-07-2018, 12:16 PM,
#6
RE: Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
मैंने यकीन किया कि उसकी आँखें बंधी हैं और मैं पलट गई। वह अपने हाथ आगे फैलाते हुए हुआ बिस्तर के किनारे तक आया। उसके घुटने बिस्तर को लगते ही उसने अपने हाथ नीचे किये और मुझे टटोलने लगा। मुझे उसे देख देखकर ही गुदगुदी होने लगी थी। उसका एक हाथ मेरी कलाई और एक मेरे पेट को लगा। पेट वाले हाथ को वह रेंगा कर नीचे ले गया और मेरे घाघरे के नाड़े को टटोलने लगा। मेरी गुदगुदी और कौतूहल का कोई ठिकाना नहीं था। मैं इधर उधर हिलने लगी। मैं नाड़े के किनारों को घाघरे के अंदर डाल कर रखती हूँ... उसकी उँगलियों को नाड़े की बाहरी गाँठ तो मिल गई पर नाड़े का सिरा नहीं मिला... तो उसने अपनी उँगलियाँ घाघरे के अंदर डालने की कोशिश की।

"ये क्या कर रहे हो?" मैंने अपना पेट अकड़ाते हुए पूछा।

"तुम मेरी शर्त भूल गई?"

"मुझे अच्छी तरह याद है... तुम बंद आँखों से मेरे पूरे बदन पर मालिश करोगे।"

"तो करने दो ना..."

"इसके लिए कपड़े उतारने पड़ेंगे?" मैंने वास्तविक अचरज में पूछा।

"और नहीं तो क्या... मालिश कपड़ों की थोड़े ही करना है... अब अपनी बात से मत पलटो।" कहते हुए उसने घाघरे में उँगलियाँ डाल दी और नाड़ा खोलने लगा। मेरी गुदगुदी और तीव्र हो गई... मैं कसमसाने लगी। भोंपू भी मज़े ले ले कर घाघरे का नाड़ खोलने लगा...उसकी चंचल उँगलियाँ मेरे निचले पेट पर कुछ ज्यादा ही मचल रही थीं। हम दोनों उत्तेजित से हो रहे थे... मुझे अपनी योनि में तरावट महसूस होने लगी।

"तुम बहुत गंदे हो !" कहकर मैं निढाल हो गई। उसकी उँगलियों का खेल मेरे पेट पर गज़ब ढा रहा था। उसने मेरे घाघरे के अंदर पूरा हाथ घुसा ही दिया और नाड़ा बाहर निकाल कर खोल दिया। नाड़ा खुलते ही उसने एक हाथ मेरे कूल्हे के नीचे डाल कर उसे ऊपर उठा दिया और दूसरे हाथ से मेरा घाघरा नीचे खींच दिया और मेरी टांगों से अलग कर दिया। मुझे बहुत शर्म आ रही थी... मेरी टांगें अपने आप ज़ोर से जुड़ गई थीं... मेरे हाथ मेरी चड्डी पर आ गए थे और मैंने घुटने मोड़ कर अपनी छाती से लगा लिए। भोंपू ने घाघरा एक तरफ करके जब मुझे टटोला तो उसे मेरी नई आकृति मिली। वह बिस्तर पर चढ़ गया और उसने बड़े धीरज और अधिकार से मुझे वापस औंधा लिटा दिया। वह भी वापस से मुझ पर 'सवार' हो गया और अपने हाथों को पोला करके मेरी पीठ पर फिराने लगा। मेरे रोंगटे खड़े होने लगे। अब उसने अपने नाखून मेरी पीठ पर चलाने शुरू किये... पूरी पीठ को खुरचा और फिर पोली हथेलियों से सहलाने लगा। मुझे बहुत आनन्द आ रहा था... योनि पुलकित हो रही थी और खुशी से तर हो चली थी।

अब वह थोड़ा नीचे सरक गया और अपनी मुठ्ठियों से मेरे चूतड़ों को गूंथने लगा। जैसे आटा गूंदते हैं उस प्रकार उसकी मुठ्ठियाँ मेरे कूल्हों और जाँघों पर चल रही थीं। थोड़ा गूंथने के बाद उसने अपनी पोली उँगलियाँ चलानी शुरू की और फिर नाखूनों से खुरचने लगा। मुझ पर कोई नशा सा छाने लगा... मेरी टांगें अपने आप थोड़ा खुल गईं। उसने आगे झुक कर मेरे चूतड़ों के दोनों गुम्बजों को चूम लिया और मेरी चड्डी की इलास्टिक को अपने दांतों में पकड़ कर नीचे खींचने लगा।

ऊ ऊ ऊ ऊह... भोंपू ये क्या कर रहा है? कितना गन्दा है? मैंने सोचा। उसकी गरम सांस मेरे चूतड़ों में लग रही थी। पर वह मुँह से चड्डी नीचे करने में सफल नहीं हो रहा था। चड्डी वापस वहीं आ जाती थी। पर वह मानने वाला नहीं था। उसने भी एक बार ज़ोर लगा कर चड्डी को एक चूतड़ के नीचे खींच लिया और झट से दूसरा हिस्सा मुँह में पकड़ कर दूसरे चूतड़ के नीचे खींच लिया। अपनी इस सफलता का इनाम उसने मेरे दोनों नग्न गुम्बजों को चूम कर लिया और फिर धीरे धीरे मेरी चड्डी को मुँह से खींच कर पूरा नीचे कर दिया। चड्डी को घुटनों तक लाने के बाद उसने अपने हाथों से उसे मेरी टांगों से मुक्त करा दिया।

हाय ! अब मैं पूरी तरह नंगी थी। शुक्र है उसकी आँखों पर पट्टी बंधी है।

भोंपू ने और कुछ देर मेरी जाँघों और चूतड़ों की मालिश की। उसकी उँगलियाँ और अंगूठे मेरी योनि के बहुत करीब जा जा कर मुझे छेड़ रहे थे। मेरे बदन में रोमांच का तूफ़ान आने लगा था। मेरी योनि धड़क रही थी... योनि को उसकी उँगलियों के स्पर्श की लालसा सी हो रही थी... वह मुझे सता क्यों रहा था? यह मुझे क्या हो रहा है? मेरे शरीर में ऐसी हूक कभी नहीं उठी थी... मुझे मेरी योनि द्रवित होने का अहसास हुआ... हाय मैं मर जाऊँ... भोंपू मेरे बारे में क्या सोचेगा ! मैंने अपनी टांगें भींच लीं।

भोंपू को शायद मेरी मनोस्थिति का आभास हो गया था... उसने आगे झुक कर मेरे सर और बालों में प्यार से हाथ फिराया और एक सांत्वना रूपी चपत मेरे कंधे पर लगाई... मानो मुझे भरोसा दिला रहा था।

मैंने अपने आप को संभाला... आखिर मुझे भी मज़ा आ रहा था... एक ऐसा मज़ा जो पहले कभी नहीं आया था... और जो कुछ हो रहा था वह मेरी मंज़ूरी से ही तो हो रहा था। भोंपू कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं कर रहा था। इस तरह मैंने अपने आप को समझाया और अपने शरीर को जितना ढीला छोड़ सकती थी, छोड़ दिया। भोंपू ने एक और पप्पी मेरी पीठ पर लगाई और मेरे ऊपर से उठ गया।

"एक मिनट रुको... मैं अभी आया !" भोंपू ने मुझे चादर से ढकते हुए कहा और चला गया। जाते वक्त उसने अपनी आँखें खोल ली थीं।

कोई 3-4 मिनट बाद मुझे बाथरूम से पानी चलने की आवाज़ आई और वह वापस आ गया। उसके हाथ में एक कटोरी थी जो उसने पास की कुर्सी पर रख दी और बिस्तर के पास आ कर अपनी आँखों पर दुपट्टा बाँध लिया।

मैंने चोरी नज़रों से देखा कि उसने अपनी कमीज़ उतार कर एक तरफ रख दी। उसकी चौड़ी छाती पर हल्के हल्के बाल थे। अब उसने अपनी पैन्ट भी उतार दी और वह केवल अपने कच्छे में था। मेरी आँखें उसके कच्छे पर गड़ी हुई थीं। उसकी तंदरुस्त जांघें और पतला पेट देख कर मेरे तन में एक चिंगारी फूटी। उसका फूला हुआ कच्छा उसके अंदर छुपे लिंग की रूपरेखा का अंदाजा दे रहा था। मेरे मन ने एक ठंडी सांस ली।

मैं औंधी लेटी हुई थी... उसने मेरे ऊपर से चादर हटाई और पहले की तरह ऊपर सवार हो गया। उसने मेरी पीठ पर गरम तेल डाला और अपने हाथ मेरी पीठ पर दौड़ाने लगा। बिना किसी कपड़े की रुकावट से उसके हाथ तेज़ी से रपट रहे थे। उसने अपने हथेलियों की एड़ी से मेरे चूतड़ों को मसलना और गूंदना शुरू किया... उसके अंगूठे मेरे चूतड़ों की दरार में दस्तक देने लगे। भोंपू बहुत चतुराई से मेरे अंगों से खिलवाड़ कर रहा था... मुझे उत्तेजित कर रहा था।

अब उसने अपना ध्यान मेरी टांगों पर किया। वह मेरे कूल्हों पर घूम कर बैठ गया जिससे उसका मुँह मेरे पांव की तरफ हो गया। उसने तेल लेकर मेरी टांगों और पिंडलियों पर लगाना शुरू किया और उनकी मालिश करने लगा। कभी कभी वह अपनी पोली उँगलियाँ मेरे घुटनों के पीछे के नाज़ुक हिस्से पर कुलमुलाता... मैं विचलित हो जाती।

अब उसने एक एक करके मेरे घुटने मोड़ कर मेरे तलवों पर तेल लगाया। मेरे दाहिने तलवे को तो उसने बड़े प्यार से चुम्मा दिया। शायद वह कल की मालिश का शुक्रिया अदा कर रहा था !! मेरे तलवों पर उसकी उँगलियों मुझे गुलगुली कर रही थीं जिससे मैं कभी कभी उचक रही थी। उसने मेरे पांव की उँगलियों के बीच तेल लगाया और उनको मसल कर चटकाया। मैं सातवें आसमान की तरफ पहुँच रही थी।

उसने आगे की ओर पूरा झुक कर मेरे दोनों चूतड़ों को एक एक पप्पी कर दी और पोले हाथों से उनके बीच की दरार में उंगली फिराने लगा।

बस... न जाने मुझे क्या हुआ... मेरा पूरा बदन एक बार अकड़ सा गया और फिर उसमें अत्यंत आनन्ददायक झटके से आने लगे... पहले 2-3 तेज़ और फिर न जाने कितने सारे हल्के झटकों ने मुझे सराबोर कर दिया... मैं सिहर गई .. मेरी योनि में एक अजीब सा कोलाहल हुआ और फिर मेरा शरीर शांत हो गया।

इस दौरान भोंपू ने अपना वज़न मेरे ऊपर से पूरी तरह हटा लिया था। मेरे शांत होने के बाद उसने प्यार से अपना हाथ मेरी पीठ पर कुछ देर तक फिराया। मेरे लिए यह अभूतपूर्व आनन्द का पहला अनुभव था।

थोड़ी देर बाद भोंपू ने दोनों टांगों और पैरों की मालिश पूरी की और वह अपनी जगह बैठे बैठे घूम गया। मेरे पीछे के पूरे बदन पर तेल मालिश हो चुकी थी। उसने उकड़ू हो कर अपने आप को ऊपर उठाया और मेरे कूल्हे पर थपथपाते हुए मुझे पलट कर सीधा होने के लिए इशारा किया।

मैं झट से सीधी हो गई। वह एक बार फिर घूम कर मेरे पैरों की तरफ मुँह करके घुटनों के बल बैठ गया और तेल लगा कर मेरी टांगों की मालिश करने लगा। पांव से लेकर घुटनों के थोड़ा ऊपर तक उसने खूब हाथ चलाये। फिर वह थोड़ा पीछे खिसक कर मेरे पेट के बराबर घुटने टेक कर बैठ गया और उसने मेरी जाँघों पर तेल लगाना शुरू किया।

अब मुझे बहुत गुदगुदी होने लगी थी और मैं बेचैन होकर हिलने लगी थी। उसने मेरी टांगों को थोड़ा सा खोला और और जांघों के अंदरूनी हिस्से पर तेल लगाने लगा... उसके अंगूठे मेरे योनि के इर्द-गिर्द बालों के झुरमुट को छूने लगे थे... पर उसने मेरी योनि को नहीं छुआ... मेरी योनि से पानी पुनः बहने लगा था... उसके हाथ बड़ी कुशलता से मेरी योनि से बच कर निकल रहे थे।

मेरी व्याकुलता और बढ़ रही थी। अब मेरा जी चाह रहा था कि वह मेरी योनि में ऊँगली डाले। जब उसका अंगूठा या उंगली मेरी योनि के पास आती तो मैं अपने आप को हिला कर उसे अपनी योनि के पास ले जाने की कोशिश करती... पर वह होशियार था। उसे लड़की को सताना और बेचैन करना अच्छे से आता था।

कुछ देर मुझे इस तरह तड़पा कर उसने घूम कर मेरी तरफ मुँह कर लिया। वह मेरे पेट के ऊपर ही उकड़ू बैठा था। मैंने देखा कि उसका कच्छा बुरी तरह तना हुआ है। उसने हाथ में तेल लेकर मेरे स्तनों पर लगाया और उन्हें सहलाने लगा... सहला सहला कर उसने तेल पूरे स्तनों पर लगा दिया और फिर अपनी दोनों हथेलियाँ सपाट करके मेरे निप्पलों पर रख उन्हें गोल गोल घुमाने लगा। मेरे स्तन उभरने और निप्पल अकड़ने लगे। थोड़ी ही देर में निप्पल बिल्कुल कड़क हो गए तो उसने अपनी दोनों हथेलियों से मेरे मम्मों को नीचे दबा दिया। मुझे लगा मेरे निप्पल उसकी हथेलियों में गड़ रहे हैं।

अब वह मज़े ले ले कर मेरे मम्मों से खेल रहा था। मैं जैसे तैसे अपने आप को मज़े में उचकने से रोक रही थी। उसके बड़े बड़े मर्दाने हाथ मेरे नाज़ुक स्तनों को बहुत अच्छे लग रहे थे। कभी कभी मेरा मन करता कि वह उन्हें और ज़ोर से दबाए। पर वह बहुत ध्यान से उनका मर्दन कर रहा था।

भोंपू अब थोड़ा पीछे की ओर सरका और अपने चूतड़ मेरी जाँघों के ऊपर कर लिए। उसने अपने घुटनों और नीचे की टांगों पर अपना वज़न लेते हुए अपने ढूंगे मेरी जाँघों पर टिका दिए। इस तरह अपना कुछ वज़न मेरी जांघों पर छोड़ कर शायद उसे कुछ राहत मिली। वह काफी देर से उकड़ू बैठा हुआ था... उसके मुँह से एक गहरी सांस छूट गई।

kramashah.........................
Reply
07-07-2018, 12:17 PM,
#7
RE: Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
जवानी की दहलीज-4

कुछ पल सुस्ताने के बाद उसने आगे झुक कर मेरे दोनों मम्मों को एक एक करके चूमा। मैं इसके लिए तैयार नहीं थी और मैं सिहर उठी। उसने और आगे झुकते हुए अपना सीना मेरी छाती से लगा दिया। फिर अपने पैर पीछे को पसारते हुए अपना पेट मेरे पेट से लगा दिया। अब वह घुटने और हाथों के बल मेरे ऊपर लेट सा गया था और उसने अपना सीना और पेट मेरी छाती और पेट पर गोल गोल घुमाने लगा था।

वाह ! क्या मज़ा दे रहा था !! उसका कच्छे में जकड़ा लिंग मेरी नाभि के इर्द-गिर्द छू रहा था... मानो उसकी परिक्रमा कर रहा हो। मेरे तन-मन में कामाग्नि ज़ोर से भडकने लगी थी। मेरा मन तो कर रहा था उसका कच्छा झपट कर उतार दूं और उसके लिंग को अपने में समा लूं। पर क्या करती... लज्जा, संस्कार और भय... तीनों मुझे रोके हुए थे। जहाँ मेरा शरीर समागम के लिए आतुर हो रहा था वहीं मेरे दिमाग में एक ज़ोर का डर बैठा हुआ था। सुना था बहुत दर्द होता है... खून भी निकलता है... और फिर बच्चा ठहर गया तो क्या? यह सोच कर मैं सहम गई और अपने बेकाबू होते बदन पर अंकुश डालने का प्रयास करने लगी।

पर तभी भोंपू घूमते घूमते थोड़ा और पीछे खिसका और अब उसका लिंग मेरे निचले झुरमुट के इर्द-गिर्द घूमने लगा। मेरे अंग-प्रत्यंग में जैसे डंक लग गया और मेरी कामोत्तेजना ने मेरे दिमाग के सब दरवाज़े बंद कर दिए। मैं सहसा उचक गई और मेरी योनि से रस की धारा सी बह निकली।

भोंपू की आँखें बंद थीं सो वह मेरी दशा देख नहीं पा रहा था पर उसको मेरी स्थिति का पूरा अहसास हो रहा था।

"कैसा लग रहा है?" उसने अचानक पूछा।

उसकी आवाज़ सुनकर मैं चोंक सी गई... जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो। मैं कुछ नहीं बोली।

"क्यों... अच्छा नहीं लग रहा?"

मुझे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था। कुछ भी कहने से ग्लानि-भाव और शर्म महसूस हो रही थी। मैं चुप ही रही।

"ओह... शायद तुम्हें मज़ा नहीं आया... देखो शायद अब आये..." कहते हुए वह ऊपर हुआ और उसने अपने होंट मेरे होंटों पर रख दिए।

मैं सकपका गई... मेरे होंट अपने आप बंद हो गए और मैंने आँखें बंद कर लीं। भोंपू ने अपनी जीभ के ज़ोर से पहले मेरे होंट और फिर दांत खोले और अपनी जीभ को मेरे मुँह में घुसा दिया। फिर जीभ को दायें-बाएं और ऊपर नीचे करके मेरे मुँह को ठीक से खोल लिया... अब वह मेरे मुँह के रस को चूसने लगा और अपनी जीभ से मेरे मुँह का अंदर से मुआयना करने लगा। साथ ही उसने अपना बदन मेरे पेट और छाती पर दोबारा से घुमाना चालू कर दिया। कुछ देर अपनी जीभ से मेरे मुँह में खेलने के बाद उसने मेरी जीभ अपने मुँह में खींच ली और उसे चूसने लगा।

धीरे धीरे मैं भी उसका साथ देने लगी और मुझे मज़ा आने लगा। मेरा इस तरह सहयोग पाते देख उसने अपने बदन को थोड़ा और नीचे खिसका दिया और अब उसका लिंग मेरे योनि द्वार पर दस्तक देने लगा... उसके हाथ मेरे स्तनों को मसलने लगे। मेरे तन-बदन में आग लग गई... मेरी टांगें अपने आप थोड़ा खुल गईं और उसके लिंग को मेरी जाँघों के कटाव में जगह मिल गई। मेरी हूक निकल गई और मैंने अपने घुटने मोड़ लिए... मेरा बदन रह रह कर ऊपर उचकने लगा... मेरी लज्जा और हया हवा हो गई। मैं चुदने के लिए तड़प गई...

"एक मिनट रुको !" कहकर भोंपू मुझ पर से उठा और उसने पास पड़ा तौलिया मेरे चूतड़ों के नीचे बिछा दिया। फिर उसने खड़े होकर अपना कच्छा उतार दिया। मैं लेटी हुई थी और वह बिस्तर पर मेरी कमर के दोनों तरफ पांव करके नंगा खड़ा हुआ था। उसका तना हुआ लंड मानो उसके शरीर को छोड़ के बाहर जाने को तैयार था। मैं जिस दशा में थी वहां से उसका लंड बहुत बड़ा और तगड़ा लग रहा था। भोंपू खुद भी मुझे भीमकाय दिख रहा था...

अब मुझे डर लगने लगा। उसकी आँखों पर अब भी दुपट्टा बंधा था। पर अब उसे आँखों की ज़रूरत कहाँ थी !! कहते हैं लंड की भी अपनी एक आँख होती है... जिससे वह अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है !

वह फिर से मेरे ऊपर पहले की तरह लेट गया... उसने अपनी दोनों बाहें मेरे घुटनों के नीचे से डाल कर मेरी टांगें ऊपर कर दीं और फिर अपने उफनते हुए लंड के सुपारे से मेरी कुंवारी योनि का द्वार ढूँढने लगा। वैसे तो उसकी आँखें बंद थीं पर अगर ना भी होतीं तो भी मेरी योनि के घुंघराले बालों में योनि नहीं दिखती... उसे तो ढूँढना ही पड़ता।

भोंपू योनि कपाट खोजने का काम अपने लंड की आँख से कर रहा था। वह शादीशुदा था अतः उसे यह तो पता था कहाँ ढूँढना है... उसका परम उत्तेजित लंड योनि के आस-पास हल्का हल्का दबाव डाल कर अपना लक्ष्य ढूंढ रहा था। मुझे इससे बहुत उत्तेजना हो रही थी... एक मजेदार खेल चल रहा था... मेरी योनि निरंतर रस छोड़ रही थी। मुझे अच्छा लगा कि भोंपू अपने हाथों का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। इस आँख-मिचोली में शायद दोनों को ही मज़ा आ रहा था। आखिरकार, लंड की मेहनत सफल हुई और सुपारे को वह हल्का सा गड्ढा मिल ही गया जिसे दबाने से भोंपू को लगा ये सेंध लगाने की सही जगह है।

उसने अपने आप को अपने घुटनों और हाथों पर ठीक से व्यवस्थित किया... साथ ही मेरे चूतड़ों को अपनी बाहों के सहारे सही ऊँचाई तक उठाया और फिर अपने सुपारे को मेरे योनि-द्वार पर टिका दिया। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था... मैंने अपने बदन को कड़क कर लिया था... मेरी सांस तेज़ हो गई थी और डर के मारे मेरे हाथ-पैर ठन्डे पड़ रहे थे... पर नीचे मेरी योनि व्याकुल हो रही थी... सुपारे का योनि कलिकाओं से स्पर्श उसे पुलकित कर रहा था... योनि का मन कर रहा था अपने आप को नीचे धक्का देकर लंड को अंदर ले लूं... मैं सांस सी रोके भोंपू के अगले वार का इंतज़ार कर रही थी...

तभी मुझे आवाज़ सुनाई दी... "बोलो तैयार हो? पांव के दर्द का पूरा इलाज कर दूं?"

कितना गन्दा आदमी है ये... मुझे तड़पा तड़पा कर मार देगा... मैंने सोचा... पर जवाब क्या देती... चुप रही...

उसने अपने सुपारे से मेरे योनि-द्वार पर एक-दो बार हल्का हल्का दबाव डाल कर मेरी कामाग्नि के हवन-कुंड में थोडा और घी डाला और थोड़ा और प्रज्वलित किया और फिर से पूछा .. "बोलो ना..."

मैंने जवाब में उसके सिर पर प्यार से उँगलियाँ फिरा दीं और उसके सिर को पुच्ची कर दी।

"ऐसे नहीं... बोल कर बताओ?"

"क्या?"

"यही... कि तुम क्या चाहती हो?"

"तुम बहुत गंदे हो..." मैं क्या कहती... आखिर लड़की हूँ।

"तो मैं उठूँ?" कहते हुए उसने अपने लंड का संपर्क मेरी योनि से तोड़ते हुए पूछा।

मैं मचल सी गई। मैं बहुत जोर से चुदना चाहती थी यह वह जानता था। वह मुझे छेड़ रहा था यह मैं भी जानती थी। पर क्या करती? उसका पलड़ा भारी था... शायद मेरी ज़रूरत और जिज्ञासा अधिक थी। वह तो काफी अनुभवी लग रहा था।

"जल्दी बोलो..." उसने चुनौती सी दी।

"अब और मत तड़पाओ !" मुझे ही झुकना पड़ा...

"क्या करूँ?" भोंपू मज़े लेकर पूछ रहा था।

"मेरा पूरा इलाज कर दो।" मैंने अधीर होकर कह ही दिया।

"कैसे?" उसने नादान बनते हुए मेरे धैर्य का इम्तिहान लिया।

"अब जल्दी भी करो..." मैंने झुंझलाते हुए कहा।

शायद उसे इसी की प्रतीक्षा थी... उसने धीरे धीरे सुपारे का दबाव बढ़ाना शुरू किया... उसकी आँखें बंद थीं जिस कारण सुपारा अपने निशाने से चूक रहा था और योनि-रस के कारण फिसल रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था मुझे डर ज़्यादा लग रहा है या काम-वासना ज़्यादा हो रही है। मैं बिल्कुल स्थिर हो गई थी... मैं नहीं चाहती थी कि मेरे हिलने-डुलने के कारण भोंपू का निशाना चूक जाये। जब वह दबाव बढाता, मेरी सांस रुक जाती। मुझे पता चल रहा था कब उसका सुपारा सही जगह पर है और कब चूक रहा है। मैंने सोच लिया मुझे ही कुछ करना पड़ेगा...

अगली बार जैसे ही सुपारा ठीक जगह लगा और भोंपू ने थोड़ा दबाव डाला, मैंने ऊपर की ओर हल्का सा धक्का दे दिया जिससे सुपारे का मुँह योनि में अटक गया। मेरी दर्द से आह निकल गई पर मेरी कार्यवाही भोंपू से छिपी नहीं थी। उसने नीचे झुक कर मेरे होटों को चूम लिया। वह मेरे सहयोग का धन्यवाद दे रहा था।

उसने लंड को थोड़ा पीछे किया और थोड़ा और ज़ोर लगाते हुए आगे को धक्का लगाया। मुझे एक पैना सा दर्द हुआ और उसका लंड योनि में थोड़ा और धँस गया। इस बार मेरी चीख और ऊंची थी... मेरे आंसू छलक आये थे और मैंने अपनी एक बांह से अपनी आँखें ढक ली थीं।

भोंपू ने बिना हिले डुले मेरे गाल पर से आंसू चूम लिए और मुझे जगह जगह प्यार करने लगा। कुछ देर रुकने के बाद उसने धीरे से लंड थोड़ा बाहर किया और मुझे कन्धों से ज़ोर से पकड़ते हुए लंड का ज़ोरदार धक्का लगाया। मैं ज़ोर से चिल्लाई... मुझे लगा योनि चिर गई है... उधर आग सी लग गई थी... मैं घबरा गई। उसका मूसल-सा लंड मेरी चूत में पूरा घुंप गया था... शायद वह मेरी पीठ के बाहर आ गया होगा। मैं हिलने-डुलने से डर रही थी... मुझे लग रहा था किसीने मेरी चूत में गरम सलाख डाल दी है। भोंपू मेरे साथ मानो ठुक गया था... वह मुझ पर पुच्चियों की बौछार कर रहा था और अपने हाथों से मेरे पूरे शरीर को प्यार से सहला रहा था।

काफ़ी देर तक वह नहीं हिला... मुझे उसके लंड के मेरी योनि में ठसे होने का अहसास होने लगा... धीरे धीरे चिरने और जलने का अहसास कम होने लगा और मेरी सांस सामान्य होने लगी। मेरे बदन की अकड़न कम होती देख भोंपू ने मेरे होंटों को एक बार चूमा और फिर धीरे धीरे लंड को बाहर निकालने लगा। थोड़ा सा ही बाहर निकालने के बाद उसने उसे वापस पूरा अंदर कर दिया... और फिर रुक गया... इस बार उसने मेरे बाएं स्तन की चूची को प्यार किया और उसपर अपनी जीभ घुमाई... फिर से उसने उतना ही लंड बाहर निकाला और सहजता से पूरा अंदर डाल दिया... इस बार मेरे दाहिने स्तन की चूची की बारी थी... उसे प्यार करके उसने धीरे धीरे लंड थोड़ा सा अंदर बाहर करना शुरू किया... मुझे अभी भी हल्का हल्का दर्द हो रहा था पर पहले जैसी पीड़ा नहीं। मुझे भोंपू के चेहरे की खुशी देखकर दर्द सहन करने की शक्ति मिल रही थी।

उसने धीरे धीरे लंड ज़्यादा बाहर निकाल कर डालना शुरू किया और कुछ ही मिनटों में वह लंड को लगभग पूरा बाहर निकाल कर अंदर पेलने लगा। मुझे इस दर्द में भी मज़ा आ रहा था। उसने अपनी रफ़्तार तेज़ की और बेतहाशा मुझे चोदने लगा... 5-6 छोटे धक्के लगा कर एक लंबा धक्का लगाने लगा... उसमें से अजीब अजीब आवाजें आने लगीं...हर धक्के के साथ वह ऊंह... ऊंह... आह... आहा... हूऊऊ... करने लगा ..

"ओह... तुम बहुत अच्छी हो... तुमने बहुत मज़ा दिया है।" वह बड़बड़ा रहा था।

मैंने उसके सिर में अपनी उँगलियाँ चलानी शुरू की और एक हाथ से उसकी पीठ सहलाने लगी। मुझे भी अच्छा लग रहा था।

"मन करता है तुम्हें चोदता ही रहूँ..."

...मैं उसकी हाँ में हाँ मिलाना चाहती थी... मैं भी चाहती थी वह मुझे चोदता रहे... पर मैंने कुछ कहा नहीं... बस थोड़ा उचक कर उसकी आँखों पर से पट्टी हटा दी और फिर उसकी आँखों को चूम लिया।

वह बहुत खुश हो गया। उसने चोदना जारी रखते हुए मेरे मुँह और गालों पर प्यार किया और मेरे स्तन देखकर बोला," वाह... क्या बात है !" और उनपर अपने मुँह से टूट पड़ा।

मैंने महसूस किया कि चुदाई की रफ़्तार बढ़ रही है और उसके वार भी बड़े होते जा रहे हैं। उसना अपना वज़न अपनी हथेलियों और घुटनों पर ले लिया था और वह लंड को पूरा अंदर बाहर करने लगा था। उसने अपना मरदाना मैथुन जारी रखा। उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं और वह हांफने सा लगा था... एक बार लंड पूरा अंदर डालने के बाद वह एक पल के लिए रुका और एक लंबी सांस के साथ लंड पूरा बाहर निकाल लिया। फिर उसने योनि-द्वार बंद होने का इंतज़ार किया। कपाट बंद होते ही उसने सुपारे को द्वार पर रखा और एक ज़ोरदार गर्जन के साथ अपने लट्ठ को पूरा अंदर गाड़ दिया।

मेरे पेट से एक सीत्कार सी निकली और मैं उचक गई... मेरी आँखें पथरा कर पूरी खुल गई थीं... उनका हाल मेरी योनि जैसा हो गया था। उसने उसी वेग से लंड बाहर निकाला और घुटनों के बल हो कर मेरे शरीर पर अपने प्रेम-रस की पिचकारी छोड़ने लगा... उसका बदन हिचकोले खा खा कर वीर्य बरसा रहा था... पहला फव्वारा मेरे सिर के ऊपर से निकल गया... मेरी आँखें बंद हो गईं... बाकी फव्वारे क्रमशः कम गति से निकलते हुए मेरी छाती और पेट पर गिर गए।

मैंने आँखें खोल कर देखा तो उसका लंड खून और वीर्य में सना हुआ था। खून देख कर मैं डर गई।

"यह खून?" मेरे मुँह से अनायास निकला।

भोंपू ने मेरे नीचे से तौलिया निकाल कर मुझे दिखाया... उस पर भी खून के धब्बे लगे हुए थे और वीर्य से गीला हो रहा था।

"घबराने की बात नहीं है... पहली बार ऐसा होता है।"

"क्या?"

"जब कोई लड़की पहली बार सम्भोग करती है तो खून निकलता है... अब नहीं होगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारे कुंवारेपन की सील टूट गई है... और तुमने यह सम्मान मुझे दिया है... मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ।" कहकर वह मुझ पर प्यार से लेट गया और मेरे गाल और मुँह चूमने लगा।

kramashah.........................
Reply
07-07-2018, 12:17 PM,
#8
RE: Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
जवानी की दहलीज-5

उसका बदन अभी भी हिचकोले से खा रहा था और उसका वीर्य हिचकोलों के साथ रिस रहा था। मेरे पेट पर उसका वीर्य हमारे शरीरों को गोंद की तरह जोड़ रहा था। कुछ ही देर में उसका लंड एक फुस्स गुब्बारे की माफ़िक मुरझा गया और भोंपू एक निस्सहाय बच्चे के समान अपना चेहरा मेरे स्तनों में छुपा कर मुझ पर लेटा था। वह बहुत खुश और तृप्त लग रहा था।

मैंने अपनी बाहें उस पर डाल दीं और उसके सिर के बाल सहलाने लगी। वह मेरे स्तनों को पुचपुचा रहा था और उसके हाथ मेरे बदन पर इधर उधर चल रहे थे। हम कुछ देर ऐसे ही लेटे रहे... फिर वह उठा और उसने मेरे होटों को एक बार ज़ोर से पप्पी की और बिस्तर से हट गया। उसका मूसल मुरझा कर लुल्ली बन गया था। भोंपू ने अपने आप को तौलिए में लपेट लिया।

"तो बताओ अब पांव का दर्द कैसा है?" भोंपू ने अचानक पूछा।

"बहुत दर्द है... !" मैंने मसखरी करते हुए जवाब दिया।

"क्या...?" उसने चोंक कर पूछा।

"तुमने कहा था 2-4 दिन में ठीक हो जायेगा... मुझे लगता है ज़्यादा दिन लगेंगे...!!" मैंने शरारत भरे अंदाज़ में कहा।

उसने मुझे बाहों में भर लिया और फिर बाँहों में उठा कर गुसलखाने की तरफ जाने लगा।

"तुम तो बहुत समझदार हो... और प्यारी भी... शायद 5-6 दिनों में तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी।"

"नहीं... दस-बारह दिन लगेंगे !" कहते हुए मैंने अपना चेहरा उसके सीने में छुपा दिया।

गुसलखाने पहुँच कर उसने मुझे नीचे उतारते हुए कहा "तुम मुझे नहलाओ और मैं तुम्हें !!"

"धत्त... मैं कोई बच्ची थोड़े ही हूँ !"

"इसीलिये तो मज़ा आएगा।" उसने मुझे आलिंगनबद्ध करते हुए मेरे कान में फुसफुसाया।

"चल... हट..." मैंने मना करते हुए रज़ामंदी जताई।

"पहले मैं तुम्हें नहलाता हूँ।" कहकर उसने मुझे स्टूल पर बिठा दिया और मुझ पर पानी उड़ेलने लगा। पहले लोटे के पानी से मैं ठण्ड से सिहर उठी... पानी ज़्यादा ठंडा नहीं था फिर भी मेरे गरम बदन पर ठंडा लगा। उसने एक दो और लोटे जल्दी जल्दी डाले और मेरा शरीर पानी के तापमान पर आ गया... और मेरी सिरहन बंद हुई।

"अरे ! तुमने तो मेरे बाल गीले कर दिए।"

"ओह... भई हम तो पानी सिर पर डाल कर ही नहाते हैं।" उसने साबुन लगाते हुए कहा। उसने मेरे पूरे बदन पर खूब अच्छे से साबुन लगाया और झागों के साथ मेरे अंगों के साथ खेलने लगा। वैसे तो उसने मेरे सब हिस्सों को अच्छे से साफ़ किया पर उसका ज़्यादा ध्यान मेरे मम्मों और जाँघों पर था। रह रह कर उसकी उँगली मेरे चूतड़ों के कटाव में जा रही थी और उसकी हथेलियाँ मेरे स्तनों को दबोच रही थीं। वह बड़े मज़े ले रहा था। मुझे भी अच्छा ही लग रहा था।

उसने मेरी योनि पर धीरे से हाथ फिराया क्योंकि वह थोड़ी सूजी हुई सी लग रही थी। फिर योनि के चारों ओर साबुन से सफाई की। फिर भोंपू खड़ा हो गया और मुझे भी खड़ा करके अपने सीने और पेट को मेरी छाती और पेट से रगड़ने लगा।

"मैं साबुन की बचत कर रहा हूँ... तुम्हारे साबुन से ही नहा लूँगा।"

मुझे मज़ा आ रहा था सो मैं कुछ नहीं बोली। वह घूम गया और अपनी पीठ मेरे पेट और छाती पर चलाने लगा।

अब उसने मुझे घुमाया और मेरी पीठ पर अपना सीना और पेट लगा कर ऊपर-नीचे और दायें-बाएं होने लगा। मैंने महसूस किया उसका लिंग फिर से अंगड़ाई लेने लगा था। उसका सुपारा मेरे चूतड़ों के कटाव से मुठभेड़ कर रहा था... धीरे धीरे वह मेरी पीठ में, चूतड़ों के ऊपर, लगने लगा। उसका मुरझाया लिंग लुल्ली से लंड बनने लगा था। उसके हाथ बराबर मेरे स्तनों को मसल रहे थे। उसने घुटनों से झुक कर अपने आप को नीचा किया और अपने तने हुए लंड को मेरे चूतड़ों और जाँघों में घुमाने लगा। मैं अपने बचाव में पलट गई और वह सीधा हो गया... पर मैं तो जैसे आसमान से गिरी और खजूर में अटकी... अब उसका लंड मेरी नाभि को सलाम कर रहा था | उसने फिर से अपने आप को नीचे झुकाया और उसका सुपारा मेरी योनि ढूँढने लगा।

"ये क्या कर रहे हो ?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं" कहकर वह सीधा खड़ा हो गया और मुझे नहलाने में लग गया। उसके लंड का तनाव जाता रहा और उसने मेरे ऊपर पानी डालते हुए मेरा स्नान पूरा किया।

अब मेरी बारी थी सो मैंने उसे स्टूल पर बिठाया और उस पर लोटे से पानी डालने लगी। वह भी शुरू में मेरी तरह कंपकंपाया पर फिर शांत हो गया। मैंने उसके सिर से शुरू होते हुए उसको साबुन लगाया और उसके ऊपरी बदन को रगड़ कर साफ़ करने लगी। वह अच्छे बच्चे की तरह बैठा रहा। मैंने उसे घुमा कर उसकी पीठ पर भी साबुन लगा कर रगड़ा। अब उसको खड़ा होने के लिए कहा और पीछे से उसके चूतड़ों पर साबुन लगा कर छोड़ दिया।

"ये क्या... यहाँ नहीं रगड़ोगी?" उसने शिकायत की।

तो मैंने उसके चूतड़ों को भी रगड़ दिया। उसने अपनी टांगें चौड़ी कर दीं और थोड़ा झुक गया मानो मेरे हाथों को उनके कटाव में डालने का न्योता दे रहा हो। मैंने अपने हाथ उसकी पीठ पर चलाने शुरू किये।

"तुम बहुत गन्दी हो !"

"क्यों? मैंने क्या किया?" मैंने मासूमियत में पूछा।

"क्या किया नहीं... ये पूछो क्या नहीं किया।"

"क्या नहीं किया?"

"अब भोली मत बनो।" उसने अपने कूल्हों से मुझे पीछे धकेलते हुए कहा।

मैं हँसने लगी। मुझे पता था वह क्यों निराश हुआ था। अब मैं अपने घुटनों पर नीचे बैठ गई और उसकी टांगों और पिंडलियों पर साबुन लगाने लगी। पीछे अच्छे से साबुन लगाने के बाद मैंने उसे अपनी तरफ घुमाया। उसका लिंग मेरे मुँह के बिल्कुल सामने था और उसमें जान आने सी लग रही थी। मेरे देखते देखते वह उठने लगा और उसमें तनाव आने लगा। उसकी अनदेखी करते हुए मैं उसके पांव और टांगों पर साबुन लगाने लगी।

वह जानबूझ कर एक छोटा कदम आगे लेकर अपने आप को मेरे नज़दीक ऐसे ले आया कि उसका लिंग मेरे चेहरे को छूने लगा। मैं पीछे हो गई। वह थोड़ा और आगे आ गया। मैं और पीछे हुई तो मेरी पीठ दीवार से लग गई। वह और आगे आ गया।

"यह क्या कर रहे हो?" मैंने झुंझला कर पूछा।

"इसको भी तो नहाना है।" वह अपने लंड को मेरे मुँह से सटाते हुए बोला।

"तो मेरे मुँह में क्यों डाल रहे हो?" मैंने उसे धक्का देते हुए पीछे किया।

"पहले इसे नहलाओ, फिर बताता हूँ।"

मैंने उसके लंड को हाथ में लेकर उस पर साबुन लगाया और जल्दी से पानी से धो दिया।

"बड़ी जल्दी में हो... अच्छा सुनो... तुमने कभी इसको पुच्ची की है?"

"किसको?"

"मेरे पप्पू को !"

"पप्पू?"

"तुम इसको क्या बुलाती हो?" उसने अपने लंड को मेरे मुँह की तरफ करते हुए कहा।

"छी ! इसको दूर करो..." मैंने नाक सिकोड़ते हुए कहा।

"इसमें छी की क्या बात है?... यह भी तो शरीर का एक हिस्सा है... अब तो इसे तुमने नहला भी दिया है।" उसने तर्क किया।

"छी... इसको पुच्ची थोड़े ही करते हैं... गंदे !"

"करते हैं... खैर... अभी तुम भोली हो... इसीलिए तुम्हें सब भोली कहते हैं।"

मैं चुप रही।

"अब मैं ही तुम्हें सब कुछ सिखाऊँगा।"

मैंने उसका स्नान पूरा किया और हमने एक दूसरे को तौलिए से पौंछा और बाहर आ गए।

"मुझे तो मज़ा आ गया... अब तुम ही मुझे नहलाया करो।" भोंपू ने आँख मारते हुए कहा।

"गंदे !"

"तुम्हें मज़ा नहीं आया?"

मैंने नज़रें नीची कर लीं।

"चलो एक कप चाय हो जाये !" उसने सुझाव दिया।

"अब तो खाने का समय हो रहा है... गुंटू शीलू आते ही होंगे।" मैंने राय दी।

"हाँ, यह बात भी है... चलो उनको आने दो... खाना ही खायेंगे... मैं थोड़ा बाहर हो कर आता हूँ।" कहते हुए भोंपू बाहर चला गया।

मुझे यह ठीक लगा। शीलू और गुंटू घर आयें, उस समय भोंपू घर में ना ही हो तो अच्छा है। शायद भोंपू भी इसी ख्याल से बाहर चला गया था।

मैं खाना गरम करने में लग गई। भोंपू के साथ बिताये पल मेरे दिमाग में घूम रहे थे।

खाना खाने के बाद शीलू और गुंटू अपने स्कूल का काम करने में लग गए। भोंपू ने रात के खाने का बंदोबस्त कर ही दिया था सो वह कल आने का वादा करके जाने लगा। उसने इशारे इशारे में मुझे आगाह किया कि मुझे थोड़ा लंगड़ा कर और करहा कर चलना चाहिए। शीलू और गुंटू को लगना चाहिए कि अभी चोट ठीक नहीं हुई है। मैंने इस हिदायत को एकदम अमल में लाना शुरू किया और लंगड़ा कर चलने लगी।

मैंने खाने के बर्तन ठीक से लगाये और कुछ देर बिस्तर पर लेट गई।

"दीदी, हम बाहर खेलने जाएँ?" शीलू की आवाज़ ने मेरी नींद तोड़ी।

"स्कूल का काम कर लिया?"

"हाँ !"

"दोनों ने?"

"हाँ दीदी... कर लिया।" गुंटू बोला।

"ठीक है... जाओ... अँधेरा होने से पहले आ जाना !"

मैं फिर से लेट गई। खाना बनाना नहीं था... सो मेरे पास फुरसत थी। मेरी आँखों के सामने भोंपू का खून से सना लिंग नाच रहा था। मैंने अपनी उंगली योनि पर रख कर यकीन किया कि कोई चोट या दर्द तो नहीं है। मुझे डर था कि ज़रूर मेरी योनि चिर गई होगी। पर हाथ लगाने से ऐसा नहीं लगा। बस थोड़ी सूजन और संवेदना का अहसास हुआ। मुझे राहत मिली।

इतने में ही दरवाज़े के खटखटाने की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया।

'इस समय कौन हो सकता है?' सोचते हुए मैंने दरवाज़ा खोला।

"अरे आप?!"

सामने नितेश को देखकर मैं सकते में थी। वह मुस्कुरा रहा था... उसने सफ़ेद टी-शर्ट और निकर पहन रखी थी और उसके हाथ में बैडमिंटन का रैकिट था। उसका बदन पसीने में था... लगता था खेलने के बाद वह सीधा आ रहा था।

"क्यों? चौंक गई?"

"जी !" मैंने नीची नज़रों से कहा।

"अंदर आने को नहीं कहोगी?"

"ओह... माफ कीजिये... अंदर आइये !"

मैं रास्ते से हटी और उन्हें कुर्सी की तरफ इशारा करके दौड़ कर पानी लेने चली गई। मैंने एक धुले हुए ग्लास को एक बार और अच्छे से धोया और फिर मटके से पानी डालकर नितेश को दे दिया।

"एक ग्लास और मिलेगा?" उसने गटक से पानी पीकर कहा।

"जी !" कहते हुए मैंने ग्लास उनके हाथ से लिया और जाने लगी तो नितेश ने मेरा हाथ थाम लिया।

"घर में अकेली हो?"

"जी... शीलू, गुंटू खेलने गए हैं..."

"मुझे मालूम है... मैं उनके जाने का ही इंतज़ार कर रहा था..."

"जी?" मेरे मुँह से निकला।

"मैं तुमसे अकेले में मिलना चाहता था।"

मैंने कुछ नहीं कहा पर पहली बार नज़र ऊपर करके नितेश की आँखों में आँखें डाल कर देखा।

"तुम बहुत अच्छी लगती हो !" नितेश ने मेरा हाथ और ज़ोर से पकड़ते हुए कहा।

"जी, मैं पानी लेकर आई !" कहते हुए मैं अपना हाथ छुड़ा कर रसोई में लंगडाती हुई भागी। मेरी सांस तेज़ हो गई थी और मेरे माथे पर पसीना आ गया था।

नितेश मेरे पीछे पीछे रसोई में आया और पूछने लगा," यः तुम्हारे पांव को क्या हुआ?"

"गिर गई थी।" मैंने दबी आवाज़ में कहा।

"मोच आई है?"

"जी !"

"तो भाग क्यों रही हो?"

मेरा पास इसका कोई जवाब नहीं था।

"मेरी तरफ देखो !" नितेश ने एक बार फिर मेरा हाथ पकड़ा और कहा।

मैंने नज़रें नीची ही रखीं।

"देखो, शरमाओ मत... ऊपर देखो !" मैंने धीरे धीरे ऊपर देखा। उसके चहरे पर मुस्कराहट थी।

"तुम इसीलिए मुझे बहुत अच्छी लगती हो... तुम शर्मीली हो..."

मेरी आँखें नीची हो गईं।

"देखो... फिर शरमा गई... आजकल शर्मीली लड़कियाँ कहाँ मिलती हैं... मेरे कॉलेज में देखो तो पता चलेगा... लड़के ही शरमा जाएँ !"

मैं क्या कहती... चुप रही... और उसको पानी का ग्लास दे दिया। उसने एक लंबी सांस ली और एक ही सांस में पी गया

"आह... मज़ा आ गया।" मैंने नितेश की तरफ प्रश्नवाचक निगाह उठाई।

"तुम्हारे हाथ का पानी पीकर !!" वह बोला।

वैसे मुझे नितेश अच्छा लगता था पर मुझे उसकी साथ दोस्ती या कोई रिश्ता बनाने में रूचि नहीं थी। मेरे और उसके बीच इतना फर्क था कि दूर ही रहना बेहतर था। मुझे माँ की वह बात याद थी कि दोस्ती और रिश्ता हमेशा बराबर वालों के साथ ही चलता है। मेरी परख में नितेश कोई बिगड़ा हुआ अय्याश लड़का नहीं था और ना ही उसके बर्ताव में घमण्ड की बू आती थी... बल्कि वह तो मुझे एक सामान्य और अच्छा लड़का लगता था। ऐसे में उसका इस तरह मेरी तारीफ करना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था परन्तु हमारे सामाजिक फासले की खाई पाटना मेरे लिए दुर्लभ था। मेरे मन में कश्मकश चल रही थी...

"क्या सोच रही हो? कि मैं एक अमीर लड़का हूँ और तुम्हारे साथ दोस्ती नहीं कर सकता?"

"जी नहीं... सोच रही हूँ कि मैं एक गरीब लड़की हूँ और आपके साथ कैसे दोस्ती कर सकती हूँ?"

"तुम मेरी दोस्त हो गई तो गरीब कहाँ रही?... देखो, मैं उनमें से नहीं जो तुम्हारी जवानी और देह का इस्तेमाल करना चाहते हैं..."

"मैं जानती हूँ आप वैसे नहीं हैं... फिर भी... कहाँ आप और कहाँ मैं?" कहते कहते मेरी आँखों में आंसू आ गए और मैंने अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया।

kramashah.........................
Reply
07-07-2018, 12:17 PM,
#9
RE: Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
जवानी की दहलीज-6

नितेश ने मेरे हाथ मेरे चेहरे से हटाये और मुझे गले लगा लिया। मैं और भी सहम गई और सांस रोके खड़ी रही।

"घबराओ मत... मैं कोई ज़ोर जबरदस्ती नहीं करूँगा... दोस्ती तो तुम्हारी मर्ज़ी से ही होगी... जब तुम मुझे अपने लायक समझने लगोगी..."

"आप ऐसा क्यों कह रहे हैं... मेरा मतलब यह नहीं था... मैं ही आप के काबिल नहीं हूँ..."

"ऐसा मत सोचो... तुम्हारे पास धन नहीं है, बस... बाकी तुम्हारे पास वह सब है जो किसी भले मानस को एक लड़की में चाहिए होता है।"

मैं यह सुनकर बहुत खुश हुई। हम अभी भी आलिंगनबद्ध थे... मैंने अपने हाथ उठा कर उसकी पीठ पर रख दिए। उसने मेरे हाथ का स्पर्श भांपते ही मुझे और ज़ोर से जकड़ लिया और मेरे गाल पर प्यार कर लिया। थोड़ी देर हम ऐसे ही खड़े रहे। फिर उसने अपने आप को छुटाते हुए कहा," तुम ठीक कहती हो... दोस्ती बराबर वालों से ही होती है..." मैं फिर से सहम गई।

"इसलिए, अब से हम बराबर के हैं, हमारी उम्र तो वैसे भी एक सी ही है... तुम मुझसे तीन साल छोटी हो, इतना फर्क चलेगा... अब से तुम मुझे मेरे नाम से बुलाओगी... ठीक है?"

"जी !" मैंने कहा।

"अब से जी वी नहीं चलेगा... तुम मुझसे दोस्त की तरह पेश आओगी... ठीक है?"

"जी !"

"फिर वही जी... मेरा नाम क्या है?"

"जी, मालूम है !"

"मेरा नाम बोलो..."

"जी...!"

"एक बार और जी बोला तो मैं गुस्सा हो जाऊँगा।" उसने मेरी बात काटते हुए चेतावनी दी...

"अब मेरा नाम लो।"

"नितेश जी।"

"उफ़... ये जी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगा क्या?" नितेश ने गुसैले प्यार से कहा और मुझे फिर से गले लगा लिया।

"तुम्हारे होटों पर मेरा नाम कितना प्यारा लगता है... सरोजा जी।"

"आप मुझे जी क्यों कह रहे हैं? आप मुझसे बड़े हैं... दोस्ती का मतलब यह नहीं कि हम अदब और कायदे भूल जाएँ... आप मुझे भोली ही बुलाइए... मैं आपका नाम नहीं लूंगी... हमारे यहाँ यही रिवाज़ है।" मैंने आलिंगन तोड़ते हुए दृढ़ता से कहा

"ओह... तुम इतने दिन कहाँ थीं? तुम कितनी समझदार हो !... ठीक है... जैसा तुम कहोगी वैसा ही होगा।" नितेश ने मुझसे प्रभावित होते हुए कहा और फिर से अपनी बाहों में ले लिया।

मुझे अपनी यह छोटी सी जीत अच्छी लगी। अब हम दोनों सोच नहीं पा रहे थे कि आगे क्या करें। मैंने ही अपने आप को उसकी बाहों से दूर किया और पूछा," चाय पियेंगे?"

"उफ़... ऐसे ही चाय नहीं बना सकती?" नितेश ने फिर से मेरी तरफ बाहें करते हुए कहा।

"जी नहीं !" मैंने 'जी' पर कुछ ज़्यादा ही ज़ोर देते हुए उसे चिढ़ाया और उसके चंगुल से बचती हुई गैस पर पानी रखने लगी।

"चलो मैं भी देखूं चाय कैसे बनती है।" नितेश मेरे पीछे आकर खड़े होकर बोला।

"आपको चाय भी बनानी नहीं आती?" मैंने आश्चर्य से पूछा।

"जी नहीं !" उसने 'जी' पर मुझसे भी ज़्यादा ज़ोर देकर कहा।

मैं हँस पड़ी।

"तुम हँसती हुई बहुत अच्छी लगती हो !"

"और रोती हुई?" मैंने रुआंसी सूरत बनाते हुए पूछा।

"बिल्कुल गन्दी लगती हो... डरावनी लगती हो।" नितेश ने हँसते हुए कहा।

"आप भी हँसते हुए अच्छे लगते हो।"

"और रोता हुआ?"

"छी... रोएँ तुम्हारे दुश्मन... मैं तुम्हें रोने नहीं दूँगी।" ना जाने कैसे मैंने यह बात कह दी। नितेश चकित भी हुआ और खुश भी।

"सच... मुझे रोने नहीं दोगी... I am so lucky !! मैं भी तुम्हें कभी रोने नहीं दूंगा।" कहकर उसने मेरे चेहरे को अपने हाथों में ले लिया और इधर-उधर चूमने लगा।

"अरे अरे... ध्यान से... पानी उबल रहा है।" मैंने उसे होशियार किया।

"सिर्फ पानी ही नहीं उबल रहा... तुमने मुझे भी उबाल दे दिया है..." नितेश ने मुझे गैस से दूर करते हुए दीवार के साथ सटा दिया और पहली बार मेरे होंटों पर अपने होंट रख दिए। मैंने आँखें बंद कर लीं।

नितेश बड़े प्यार से मेरे बंद मुँह को अपने मुँह से खोलने की मशक्क़त करने लगा। उसने मुझे दीवार से अलग करके अपनी तरफ खींचा और अपनी बाँहें मेरी पीठ पर रखकर दोबारा मुझे दीवार से लगा दिया। अब उसके हाथ मेरी पीठ को और उसके होंट और जीभ मेरे मुँह को टटोल रहे थे। मैंने कुछ देर टालम-टोल करने के बाद अपना मुँह खुलने दिया और उसकी जीभ को प्रवेश की इजाज़त दे दी। नितेश ने एक हाथ मेरी पीठ से हटाकर मेरे सिर के पीछे रख दिया और उसके सहारे मेरे सिर को थोड़ा टेढ़ा करके अपने लिए व्यवस्थित किया। अब उसने अपना मुँह ज़्यादा खोलकर मेरे मुँह में अपनी जीभ डाल दी और दंगल करने लगा। उसकी जीभ मेरे मुँह में चंचल हिरनी की तरह इधर उधर जा रही थी। नितेश एक प्यासे बच्चे की तरह मेरे मुँह का रसपान कर रहा था। उसने मेरी जीभ को अपने मुँह में खींच लिया और मुझे भी उसके रस का पान करने के लिए विवश कर दिया।

मैंने हिम्मत करके अपनी जीभ उसके मुँह में फिरानी शुरू कर दी।

अचानक मुझे गुंटू के दौड़ कर आने की आवाज़ आने लगी। वह "दीदी... दीदी..." चिल्लाता हुआ आ रहा था। मैंने हडबड़ा कर अपने आपको नितेश से अलग किया... एक हाथ से अपने कपड़े सीधे किये और दूसरे से अपना मुँह साफ़ किया और नितेश को "सॉरी !" कहती हुई बाहर भाग गई। उस समय मैं लंगड़ाना भूल गई थी... पता नहीं गुंटू को क्या हो गया था... मुझे चिंता हो रही थी। मैं जैसे ही दरवाज़े तक पहुंची, गुंटू हांफता हांफता आया और मुझसे लिपट कर बोला,"दीदी... दीदी... पता है...?"

"क्या हुआ?" मैंने चिंतित स्वर में पूछा।

"पता है... हम बगीचे में खेल रहे थे..." उसकी सांस अभी भी तेज़ी से चल रही थी।

"हाँ हाँ... क्या हुआ?"

"वहाँ न... मुझे ये मिला .." उसने मुझे एक 100 रुपए का नोट दिखाते हुए बताया।

"बस?... मुझे तो तुमने डरा ही दिया था।"

"दीदी .. ये 100 रुपए का नोट है... और ये मेरा है.."

"हाँ बाबा... तेरा ही है... खेलना पूरा हो गया?"

"नहीं... ये रख... किसी को नहीं देना..." गुंटू मेरे हाथ में नोट रख कर वापस भाग गया। मुझे राहत मिली कि उसे कोई चोट वगैरह नहीं लगी थी। मैं दरवाज़ा बंद करके, लंगड़ाती हुई, वापस रसोई में आ गई जहाँ नितेश छुप कर खड़ा था।

"इस लड़के ने तो मुझे डरा ही दिया था" मैंने दुपट्टे से अपना चेहरा पोंछते हुए कहा।

"मुझे भी !" नितेश ने एक ठंडी सांस छोड़ते हुए जवाब दिया।

"आपको क्यों?"

"अरे... अगर वह हमें ऐसे देख लेता तो?"

"गुंटू तो बच्चा है।" मैंने सांत्वना दी।

"आजकल के बच्चों से बच कर रहना... पेट से ही सब कुछ सीख कर आते हैं !!" उसने मुझे सावधान करते हुए कहा।

"सच?" मैंने अचरज में पूछा।

"हाँ... इन को सब पता होता है... खैर, अब मैं चलता हूँ... वैसे अगले सोमवार मेरी सालगिरह है... मैं तो तुम्हें न्योता देने आया था।"

"मुझे?"

"और नहीं तो क्या? मेरी पार्टी में नहीं आओगी?"

"देखो, अगर तुम मुझे अपना असली दोस्त समझते हो तो मेरी बात मानोगे..." मैंने गंभीर होते हुए कहा।

"क्या?"

"यही कि मैं तुम्हारी पार्टी में नहीं आ सकती।"

"क्यों?"

"क्योंकि सब तुम्हारी तरह नहीं सोचते... और मैं वहाँ किसी और को नहीं जानती... तुम सारा समय सिर्फ मेरे साथ नहीं बिता पाओगे ... फिर मेरा क्या?"

"तुम वाकई बहुत समझदार हो... पर मैं तुम्हारे साथ भी तो अपना जन्मदिन मनाना चाहता हूँ।" उसने बच्चों की तरह कहा।

"मैं भी तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें बधाई देना चाहती हूँ... पर इसके लिए पार्टी में आना तो ज़रूरी नहीं।"

"फिर?"

"पार्टी किस समय है?"

"शाम को 7 बजे से है "

"ठीक है... अगर तुम दोपहर को आ सकते हो तो यहाँ आ जाना... मैं तुम्हारे लिए अपने हाथ से खाना बनाऊँगी..."

"सच?"

"सच !"

"ठीक है... भूलना मत !"

"मैं तो नहीं भूलूंगी... तुम मत भूलना... और देर से मत आना !"
Reply
07-07-2018, 12:18 PM,
#10
RE: Nangi Sex Kahani जवानी की दहलीज
"मैं तो सुबह सुबह ही आ जाऊँगा !"

"सुबह सुबह नहीं... शीलू गुंटू स्कूल चले जाएँ और मैं खाना बना लूं... मतलब 12 बजे से पहले नहीं और साढ़े 12 के बाद नहीं... ठीक है?"

"तुम्हें तो फ़ौज में होना चाहिए था... ठीक है कैप्टेन ! मैं सवा 12 बजे आ जाऊँगा।"

"ठीक है... अब भागो... शीलू गुंटू आने वाले होंगे।"

"ठीक है... जाता हूँ।" कहते हुए नितेश मेरे पास आया और मेरे पेट पर से मेरा दुपट्टा हटाते हुए मेरे पेट पर एक ज़ोरदार पप्पी कर दी।

"अइयो ! ये क्या कर रहे हो !?"... मैंने गुदगुदी से भरे अपने पेट को अंदर करते हुए कहा।

"मुझे भी पता नहीं..." कहकर नितेश मेरी तरफ हवा में पुच्ची फेंकता हुआ वहाँ से भाग गया।

रात को मुझे नींद नहीं आ रही थी। हरदम नितेश या भोंपू के चेहरे और उनके साथ बिताये पल याद आ रहे थे। मेरे जीवन में एक बड़ा बदलाव आ गया था। अब मुझे अपने बदन की ज़रूरतों का अहसास हो गया था। जहाँ पहले मैं काम से थक कर रात को गहरी नींद सो जाया करती थी वहीं आज नींद मुझसे कोसों दूर थी।

मैं करवटें बदल रही थी... जहाँ जहाँ मर्दाने हाथों के स्पर्श से मुझे आनंद मिला था, वहाँ वहाँ अपने आप को छू रही थी... पर मेरे छूने में वह बात नहीं थी। जैसे तैसे सुबह हुई और...

रात को मुझे नींद नहीं आ रही थी। हरदम नितेश या भोंपू के चेहरे और उनके साथ बिताये पल याद आ रहे थे। मेरे जीवन में एक बड़ा बदलाव आ गया था। अब मुझे अपने बदन की ज़रूरतों का अहसास हो गया था। जहाँ पहले मैं काम से थक कर रात को गहरी नींद सो जाया करती थी वहीं आज नींद मुझसे कोसों दूर थी।

मैं करवटें बदल रही थी... जहाँ जहाँ मर्दाने हाथों के स्पर्श से मुझे आनंद मिला था, वहाँ वहाँ अपने आप को छू रही थी... पर मेरे छूने में वह बात नहीं थी। जैसे तैसे सुबह हुई और...

और मैंने घर के काम शुरू किये। शीलू, गुंटू को जगाया और उनको स्कूल के लिए तैयार करवाया। मैं उनके लिए नाश्ता बनाने ही वाली थी कि भोंपू, जिस तरह रेलवे स्टेशन पर होता है... "दोसा–वड़ा–साम्भर... दोसा–वड़ा–साम्भर" चिल्लाता हुआ सरसराता हुआ घर में घुस गया।

"अरे इसकी क्या ज़रूरत थी?" मैंने ईमानदारी से कहा।

"अरे, कैसे नहीं थी ! तुम अभी काम करने लायक नहीं हो...।" उसने मुझे याद दिलाते हुए कहा और साथ ही मेरी तरफ एक हल्की सी आँख मार दी।

शीलू, गुंटू को दोसा पसंद था सो वे उन पर टूट पड़े। भोंपू और मैंने भी नाश्ता खत्म किया और मैं चाय बनाने लगी। शीलू, गुंटू को दूध दिया और वे स्कूल जाने लगे।

"अब मैं भी चलता हूँ।" भोंपू ने बच्चों को सुनाने के लिए जाने का नाटक किया।

"चाय पीकर चले जाना ना !" शीलू ने बोला," आपने इतने अच्छे दोसे भी तो खिलाये हैं !!"

"हाँ, दोसे बहुत अच्छे थे।" गुंटू ने सिर हिलाते हुए कहा।

"ठीक है... चाय पीकर चला जाऊँगा।" भोंपू ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा।

"तुम इनको स्कूल छोड़ते हुए चले जाना।" मैंने सुझाव दिया। मैं नहीं चाहती थी कि भोंपू इतनी सुबह सुबह घर पर रहे। मुझे बहुत काम निपटाने थे और वैसे भी मैं नहीं चाहती थी कि शीलू को कोई शक हो। गुंटू अभी छोटा था पर शीलू अब बच्ची नहीं रही थी, वह भी हाल ही में सयानी हो गई थी... मतलब उसे भी मासिक-धर्म शुरू हो चुका था और हमारे रिवाज़ अनुसार वह भी हाफ-साड़ी पहनने लगी थी।

मेरे सुझाव से भोंपू चकित हुआ। उसने मेरी तरफ विस्मय से देखा मानो पूछ रहा हो," ऐसा क्यों कह रही हो?"

मैंने उसे इशारों से शांत करते हुए शीलू को कहा," बाबा रे ! आज घर में बहुत काम है... मैं दस बजे से पहले नहीं नहा पाऊँगी।" फिर भोंपू की तरफ देख कर मैंने पूछा," तुम दोपहर का खाना ला रहे हो ना?"

"हाँ... खाना तो ला रहा हूँ,"

"ठीक है... समय से ले आना..." मैंने शीलू से नज़र बचाते हुए भोंपू की ओर 11 बजे का इशारा कर दिया। भोंपू समझ गया और उसके चेहरे पर एक नटखट मुस्कान दौड़ गई।

मैंने जल्दी जल्दी सारा काम खत्म किया और नहाने की तैयारी करने लगी। सवा दस बज रहे थे कि किसी ने कुण्डी खटखटाई।

मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने भोंपू खड़ा था... उसकी बांछें खिली हुई थीं, उसने अपने हाथों के थैले ऊपर उठाते हुए कहा "खाना !!"

"तुम इतनी जल्दी क्यों आ गए?"

"तुमने कहा था तुम दस बजे नहाने वाली हो..."

"हाँ... तो?"

"मैंने सोचा तुम्हारी कुछ मदद कर दूंगा...!" उसने शरारती अंदाज़ में कहा और अंदर आ गया।

"कोई ज़रूरत नहीं है... मैं नहा लूंगी !"

"सोच लो... ऐसे मौके बार बार नहीं आते !!" उसने मुझे ललचाया और घर के खिड़की दरवाज़े बंद करने लगा।

वैसे भोंपू ठीक ही कह रहा था। अगर मौकों का फ़ायदा नहीं उठाओ तो मौके रूठ जाते हैं... और बाद में तरसाते हैं। मैं बिना कुछ बोले... बाहर का दरवाज़ा बंद करके अंदर आ गई। मैंने अपना तौलिया और कपड़े लिए और गुसलखाने की तरफ बढ़ने लगी। उसने मुझे पीछे से आकर पकड़ लिया और मेरी गर्दन को चूमने लगा। मुझे उसकी मूछों से गुदगुदी हुई... मैंने अपना सिर पीछे करके अपने आप को छुड़ाया।

"अरे ! क्या कर रहे हो?"

"मैंने क्या किया? अभी तो कुछ भी नहीं किया... तुम कुछ करने दो तो करूँ ना !!!!"

"क्या करने दूँ?" मैंने भोलेपन का दिखावा किया।

"जो हम दोनों का मन चाह रहा है।"

"क्या?"

"अपने मन से पूछो... ना ना... मेरा मतलब है अपने तन से पूछो !" उसने 'तन' पर ज़ोर डालते हुए कहा।

"ओह... याद आया...एक मिनट रुको !" कहकर वह गया और अपने थैले से एक चीज़ लेकर आया और गुसलखाने में चला गया और थोड़ी देर बाद आया।

"क्या कर रहे हो?" वह क्या था?" मैंने पूछा।

"यह एक बिजली की छड़ी है... इसे हीटिंग रोड कहते हैं... इससे पानी गरम हो जायेगा... फिर तुम्हें ठण्ड नहीं लगेगी।" उसे मेरी कितनी चिंता थी। मैं मुस्कुरा दी।

वह मेरे सामने आ गया और मेरे कन्धों पर अपने हाथ रख कर और आँखों में आँखें डाल कर कहने लगा," मैं तुम्हें हर रोज़ नहलाना चाहता हूँ।"

मैं क्या कहती... मुझे भी उससे नहाना अच्छा लगा था... पर कह नहीं सकती थी। उसने मेरी चुप्पी का फ़ायदा उठाते हुए मेरे हाथों से मेरा तौलिया और कपड़े लेकर अलग रख दिए और मेरा दुपट्टा निकालने लगा। मेरे हाथ उसको रोकने को उठे तो उसने उन्हें ज़ोर से पकड़ कर नीचे कर दिया और मेरे कपड़े उतारने लगा। मैं मूर्तिवत खड़ी रही और उसने मुझे पूरा नंगा कर दिया। फिर उसने अपने सारे कपड़े उतार दिए और वह भी नंगा हो गया।

kramashah.....................
Reply


Possibly Related Threads...
Thread Author Replies Views Last Post
mastram kahani प्यार - ( गम या खुशी ) sexstories 57 2,754 7 hours ago
Last Post: sexstories
Exclamation Maa Chudai Kahani आखिर मा चुद ही गई sexstories 37 10,615 Yesterday, 11:18 AM
Last Post: sexstories
Question Kamukta kahani हरामी साहूकार sexstories 119 24,033 03-19-2019, 11:32 AM
Last Post: sexstories
Lightbulb Sex Story सातवें आसमान पर sexstories 14 5,033 03-19-2019, 11:14 AM
Last Post: sexstories
Sex Chudai Kahani सेक्सी हवेली का सच sexstories 43 84,632 03-18-2019, 08:00 PM
Last Post: Bhavy_Shah_King
Information Antarvasna kahani घरेलू चुदाई समारोह sexstories 49 27,547 03-15-2019, 02:15 PM
Last Post: sexstories
Lightbulb Sex Hindi Kahani तीन घोड़िया एक घुड़सवार sexstories 52 49,018 03-13-2019, 12:00 PM
Last Post: sexstories
Lightbulb Desi Sex Kahani चढ़ती जवानी की अंगड़ाई sexstories 27 24,945 03-11-2019, 11:52 AM
Last Post: sexstories
Star Kamukta Story मेरा प्यार मेरी सौतेली माँ और बेहन sexstories 298 195,237 03-08-2019, 02:10 PM
Last Post: sexstories
Star Hindi Sex Stories By raj sharma sexstories 230 68,274 03-07-2019, 09:48 PM
Last Post: Pinku099

Forum Jump:


Users browsing this thread: 1 Guest(s)
This forum uses MyBB addons.

Online porn video at mobile phone


Ind vs ast fast odi 02:03:2019lund geetu Sonia gand chut antervasnagirl mombtti muli sexभाई का लन्ड अंधेरे में गलती से या बहाने से चुदवा लेने की कहानीयाँmom car m dost k lund per baithilalchi ladki blue garments HD sex videoann line sex bdosAnushka sharma sexbabajub pathi bhot dino baad aya he tub bivi kese xxx sex karegiबाडी पहन कर दीखाती भाभीXxx vide sabse pahale kisame land dalajata haixxx inage HD miuni roy sex babatelugu anchor naked sexbabaक्सक्सक्स ववव स्टोरी मानव जनन कैसे करते है इस पथ के बारे में बताती मैडमsexbaba south act chut photowww.chut me land se mutna imeges kahaniMaa ki Ghodi Bana ke coda sex kahani naikapade dhir dhire utarti sex xnxx hindi sex story forumsBhavi chupke se chudbai porn chut hd full.comsex karte time dusri ort ka aajana xxxx amerikan videoDesi kudiyasex.comबेटा विदेश घर में बहु की चुदाईtelmalish sex estori hindi sbdomegeeta ne emraan ki jeebh chusiNet baba sex khanikuteyaa aadmi ka xxxneha kakkar sex fuck pelaez kajalDesimilfchubbybhabhiyaMummy ko pane ke hsrt Rajsharama story sexbaba family incestlaya nude fake pics sex babaghar pe khelni ae ladki ki chut mai ugli karke chata hindi storyburi aorat and baca bf videoदोनो बेटीयो कि वरजीन चुतटटी करती मोटी औरत का सीनsadisuda didi ko mut pilaya x storismaa ko gand marwane maai maza ata haLund ko bithaane ke upaaymom choot ka sawad chataya sex storyagar ladki gand na marvaye to kese rajhi kare usheyoni se variya bhar aata hai sex k badkamina sexbabaअनजाने में सेक्स कर बैठी.comBehen ki gand ne pagal kardiaदूध.पीता.पति.और.बुर.रगडताchuchi dudha pelate xxx video dawnlod nenu venaka nundi aaninchanu mom sex storynewsexstory com marathi sex stories E0 A4 A8 E0 A4 B5 E0 A4 B0 E0 A4 BE E0 A4 A4 E0 A5 8D E0 A4 B0pregnant chain dhaga kamar sex fuckRadhika thongi baba sex videoTelugu Saree sexbaba netdood pilati maa apne Bacca koMummy ko chote chacha se chudwate dekhaSoya ledij ke Chupke Se Dekhne Wala sexಹೆಂಡತಿ ತುಲ್ಲುpapa na maa ka peeesab piya mera samna sex storyristedaro ka anokha rista xxx sex khaniriksa wale se majburi me chudi story hindiमेरे पिताजी की मस्तानी समधनkeerthy suresh nude sex baba. netaantra vasana sex baba .comindian girls fuck by hish indianboy friendsschut ka dana chatva chudisex kahanee ya heendeemekis sex position me aadmi se pahle aurat thakegi upay batayechudai randi ki kahani dalal na dilayaपर उसका अधखिला बदन…आह अनोखा था। एक दम साफ़ गोरा बदन, छाती पर ऊभार ले रही गोलाईयाँ, जो अभी नींबू से कुछ हीं बड़ी हुई होगी जिसमें से ज्यादा तर हिस्सा भूरा-गुलाबी था vidwa.didi.boli.apni.didi.ko.pelo.ahhhhhHind sxe story सलवार शूट निरोध का ऊपायTelugu sex stories please okkasari massagemaghna naidu xxxphotosGangbang barbadi sex storiesSexbaba.net group sex chudail pariwar